Monday, 11 December 2017

रावण के लात मारने पर जीव का उद्धार

"मोह दशमौलि तद्भ्रात अंहकार
पाकारजिति काम विश्राम हारी"

विनय-पत्रिका में दशमौलि (रावण) को मोह का प्रतीक माना गया है।
मोह का परिवार बहुत व्यापक होता है। शरीर/परिवार/मित्र/वस्तुएं/जन्म स्थान/गुरु/आश्रम आदि तमाम जगह जीव का मोह होता है।
रावण का परिवार भी बहुत व्यापक है,
"एक लख पूत सवालख नाती
ता रावण के घर दिया न बाती"
मानस में मानस रोगों के वर्णन में सारी व्याधियों की जड़ कहा गया है,
"मोह सकल व्याधिन कर मूला
तिन ते पुनि उपजहिं बहु सूला"

जीव को मोह पर नियंत्रण कर पाना बहुत ही कठिन है पर यदि मोह ही जीव को लात मारकर अपने घर से भगा दे तो जीव का कल्याण हो जाता है कयोंकि तभी प्रभु उसकी शरणागति को स्वीकार करते हैं।

रावण जानता है कि उसका भाई विभीषण उसके दुश्मन राम का भक्त है। वह मोह के कारण उसे मना नहीं कर पाता।
"रामायुध अंकित गृह शोभा वरनि न जाय
नव तुलसिका बृंद तंह देखि हरिष कपिराई
लंका निशचर निकर निवासा
इहां कहां सज्जन कर बासा"----मानस

विभीषण को तब तक रावण बर्दास्त करता है जब तक वह सीता को राम को देने की बात नहीं करता। जैसे ही विभीषण सीता को राम को देने और शरणागति की बात करता है,तभी रावण यानि मोह ने लात मारकर विभीषण यानि जीव का त्याग कर दिया है। जीव का मोह नष्ट होते ही उसे प्रभु की शरणागति प्राप्त हो जाती है।
"मम पुर बस तपसिन्ह पर प्रीती
सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहुं नीतीश
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा
अनुज गहे पद बारहि सारा"---मानस

इसी प्रकार शुक जो रावण के गुप्तचर के रूप में राम जी के शिविर में गया था और वहां पकड़ लिए जाने पर लक्षमण जी उसको पिटाई से बचाकर रावण के लिए एक पत्थर देकर उसे वापिस लौटा भेज देते हैं। शुक वापिस आकर रावण को समझाता है और वह भी सीता जी को वापिस करने की बात करता है,तभी रावण(मोह) उसको भी लात मारकर भगा देता है और वह भी प्रभु राम की शरणागति में पहुंच जाता है।

"जनक सुता रघुनाथहि दीजे
एतना कहा मोर प्रभु कीजे
जब तेहि कहा देन वैदेही
चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही
नाग चरन सिरु चला सो तहां
कृपा सिंधु रघुनायक जहां
करि प्रनाम निज कथा सुनाई
राम कृपा आपनि गति पाई"----मानस

"केशव केशन असि करी जो अरिहू न कराय
चंद्रबदनि मृगलोचिनी बाबा कहि कहि जांय" - - - केशव दास।
अर्थात केशव दास जी कहते हैं कि मेरे केशों ने मेरे साथ ऐसा किया है कि कोई दुश्मन भी ऐसा नहीं करता। इन्हीं सफेद बालों के कारण ही चंद्रमा के समान मुख वाली और हिरनी के समान नेत्रों वाली युवतियां मुझे बाबा कह कह कर बुलाती हैं।
मानव का शरीर तो बृद्धावस्था में जीर्ण-शीर्ण हो जाता है पर उसका मन हमेशा जवान बना रहता है। उसकी अतृप्त कामनाएँ और वासनाएं उसे अंतिम सांस तक परेशान करती हैं। इस संबंध में कबीर का निम्न दोहा भी दर्शनीय और पठनीय है।
"माया मरी न मन मरा मर मर गया शरीर
आशा तृष्णा न मरी कह गये दास कबीर"
इससे बचने का केवल एक ही उपाय बताया गया है और वह यह कि यदि आप अपनी सारी सांसारिक ममता जिसमें आपकी सांसारिक कामनाएँ और वासनाएं भी शामिल हैं को अपने प्रभु के साथ जोड़ दें तो काम बन सकता है। जैसे आप जीभ के वश में हैं तो आप अच्छे-अच्छे व्यंजन बना कर प्रभु को भोग लगाएं और उनके प्रसाद के रूप में गृहण करें। आपको सौंदर्य अच्छा लगता है आप अपने प्रभु को अपनी इच्छानुसार सजाएँ यदि भौतिक सामर्थ्य न हो तो भाव से श्रृंगार करें और सौंदर्य का आनंद लें। यदि हम ऐसा कर सकें तो यही मानवीय कमजोरियां हमारे लिए अभिशाप की जगह वरदान बन जायेंगी।
"सबकै ममता ताग बटोरी मम पद मनहि बांधि बर डोरी"---तुलसी।
सारी ममताओं को इकठ्ठा करके और फिर उसे बट करके उसकी डोर बना कर, उस मन रूपी डोर को प्रभु कह रहे हैं कि जो उनके चरणों से बांध देता है, उसकी इच्छाएँ अशेष हो जाती हैं, वह समदर्शी हो जाता है और वह हर्ष और शोक से भी मुक्त होकर उनके हृदय में निवास करता है।

Thursday, 13 July 2017

बचपन लुका-छिपी खेलते-खेलते
एक बार ऐसे छिपा कि फिर ढूढ़े नहीं मिला

जवानी मुंह फेरकर टाटा बाय-बाय करके
 छल करके
कब चली गयी ? पता ही नहीं चला ।
कमबख्त ने एक बार भी पलट कर नहीं  देखा ।

अब यह सबसे सयाना बुढ़ापा
बिन बुलाए अनचाहे मेहमान सा
पलथी मार कर जम कर बैठ गया है
कहता है कि बचपन और जवानी को याद करके
चाहे जितना रोओ-गाओ,चीखो-चिल्लाओ
मैं तुमको लिए बगैर टलने वाला नहीं हूँ ।

अब मुझे लगता है
कि मैंने क्यों नहीं सुनी तेरी बात ?
तूने कितनी बार शास्त्रों के,महापुरुषों के द्वारा
मुझे यह समझाने का प्रयास नहीं किया
कि यह बचपन-जवानी-बुढ़ापा और यह शरीर भी
मतलब के साथी हैं
तेरे माध्यम से सांसारिक भोगों का ऐश्वर्य भोग लेने के बाद
मुंह फेर कर ऐसे चले जाएंगे कि तुम्हे जानते ही नहीं ।

मैं जानता हूँ
 कि तुम जन्म के पहले,संसार में आने के बाद
और संसार से जाने के बाद
एक तुम्ही हो जो हर पल मेरे साथ थे,हो, और रहोगे ।

मैं यह भी जानता हूँ कि अंशी अपने अंश को
अपनी बांहो में भरने के लिए
उसे पूर्णता प्रदान करके उसके अधूरेपन के दंश से
हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए तैयार है
बशर्ते एक बार अंशी उसे दिल से याद भर कर ले ।

अफसोस यह है कि मैं यह भी नहीं कर पा रहा हूँ
मेरे प्रभु,मेरे मालिक,मेरे बाप ।

मैंने यह भी सुना है कि तू अकारण करुणावरुणालय है
शायद तुझे कभी अपना यह विरद याद आ जाए

इसी आशा में शायद शेष सांसे पूरी कर रहा हूँ
मैं ।






Sunday, 9 April 2017

किसी की सेवा करने के पहले दस हजार बार उसे थन्यवाद दो कि उसने तुम्हें इस लायक समझा और अगनित  धन्यवाद दीजिए उस प्रभु को जिसने तुम्हें इस लायक बनाया ।
एक बार रहीमदास जी को बादशाह ने नाराज होकर दरबार से निकाल दिया पर उनका वेतन नहीं रोका । रहीमदास जी आकर चित्रकूट में बस गए और तभी उन्होंने यह दोहा लिखा था ।-
"चित्रकूट में रम रहे रहिमन,अवध नरेश
जा पर विपदा परत है सो आवत ऐहि देश ।"
अर्थात् अवध नरेश यानि श्री राम विपत्ति पड़ने पर चित्रकूट में आकर बसे थे,इसी प्रकार रहीम भी विपत्ति पड़ने पर कामतानाथ यानि चित्रकूट की शरण में आए हैं ।
चित्रकूट प्रवास के दौरान रहीमदास जी नित्य प्रति विपुल मात्रा में दान किया करते थे । दान करते समय उनके नेत्र हमेशा नीचे रहतै थे ।
तुलसीदास जी उनसे मिलने  चित्रकूट आए और उनकी इस विनम्रता पर एक दोहा लिखा जो इस प्रकार है ।
"कहु रहीम सीखी कहां अद्भुत ऐसी दैन
ज्यों-ज्यों कर ऊपर उठै त्यों-त्यों नीचे नैन"
अर्थात् हे रहीमदास जी आपने ऐसा अद्भुत दान देना कहां  से सीखा है कि जैसे-जैसे  देने के लिए आपके हाथ ऊपर उठते हैं त्यों-त्यों आपके नैन नीचे होते जाते हैं ।
रहीमदास जी ने इसके जवाब में यह कहा था ।
"देनवार कोई और है देत रहत दिन रैन
 लोग भरम मो पै करैं याते नीचे नैन ।"
अर्थात् देने वाला तो कोई दूसरा है जो दिन रात देता रहता  है । लोग भ्रमवश मुझे दाता मान लेते हैं, इसी शर्म के कारण मेरे नैन नीचे रहते हैं  ।

Friday, 3 March 2017

तुम्हारे प्रश्नों का जवाब तो जिन्दगी दे देगी पर जब जिन्दगी तुमसे पूंछेगी कि मैं तो खुदा की इनायत बनकर तेरे पास आई थी कि तू खुदा की इस इनायत का लाभ उठाकर,अपने को इतना ऊपर उठा ले कि खुदा को खुद तेरी मर्जी पूंछनी पड़े ।
"खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर के पहले खुदा बंदे से खुद पूँछे बता तेरी रजा क्या है ?"
पर तूने क्या किया खुदगर्ज ? अपनी अतृप्त वासनाओं को पूरी करने के लिए खुदा की इस बेहतरीन इनायत को खामख़ा जायज कर दिया । जिन्दगी के इस सवाल का है कोई जवाब तेरे पास ?

Thursday, 2 March 2017

निःसंदेह मन को पहचानना बहुत बड़ी बात है और यह भी सही है कि हर का मन अलग ढंग से चलता है ।
कुछ इसी तरह की बात अर्जुन ने कृष्ण से कही थी और कृष्ण ने जो समाधान दिया था वह इस प्रकार है ।
अर्जुन,"चंचलम् हि मनः कृष्णः प्रमाथि बलवत् दृढ़म् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव स दुष्करम्"
अर्थात् हे कृष्ण मन बहुत ही बलवान,दृढ़,संशययुक्त और चंचल है । इस मन पर नियंत्रण करना उसी प्रकार कठिन है जिस प्रकार चल रही वायु में नौका पर नियंत्रण करना ।
कृष्ण,"असंसयम् महाबाहो मनो दुर्निगहम् चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च ग्रह्यते ।"
अर्थात् हे अर्जुन निश्चित रूप से  मन बहुत ही बलवान एवं दृढ़ है तथा चंचल है पर इसे अभ्यास और वैराग्य के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है ।
अब अभ्यास और वैराग्य क्या है ? यह विषय विस्तार का है । अतः इस पर फिर कभी । इस समय केवल इतना ही कि वैराग्य का अर्थ संन्यास नहीं है अपितु संसार में कमलवत् जीवन जीने से है ।

Monday, 30 January 2017

वामदेव ऋषि की तपस्थली
तुलसी,पद्माकर,केदार,पुष्कल,पहाड़िया,की जन्मस्थली और कर्मस्थली वाला बांदा
केन की अनगढ़ कछारों वाला बांदा
बात ही बात में लाठी और गोली चलाने वाला बांदा
मूंछो की रेख आते ही
धरती पर न चलने वाला बांदा
आजादी की लड़ाई में
अपना सर्वस्य न्योछावर करने वाले
'बांदा के नवाब' वाला बांदा
हाँ हाँ वही बांदा
जहाँ पैदा होने का मुझ गर्व है
और जिसका ऋण मेरे ऊपर
अन्तिम सांस तक रहेगा 

Thursday, 19 January 2017

"परिहित सरिस धर्म नहि भाई,परपीड़ा सम नहि अधमाई ।"---रामचरित मानस ।
तुलसी ने धर्म का सार एक ही पंक्ति में कह दिया है कि दूसरे का हित करने से बड़ा कोई धर्म नहीं है और दूसरे को पीड़ा पहुँचाने से बड़ा कोई अधर्म नहीं है ।
बाल्मीकि रामायण में भरत जी माता कौशल्या से कहते हैं कि यदि राम के वनवास में उनकी कोई भूमिका हो तो उन्हें भी  वह भयंकर पाप लगे जो किसी श्रमिक को उसके श्रम के एवज में यथोचित मजदूरी न देने में लगता है ।

Saturday, 7 January 2017

सामाजिक विकास को कौन नकार सकता है । सामाजिक भौतिक विकास के साथ सामाजिक भौतिक मूल्यों में भी परिवर्तन होता है यह भी सही है किन्तु शाश्वत मूल्यों में परिवर्तन सम्भव नहीं है जैसे मानवीय  सभ्यता के जन्म के समय से ही प्रेम और घृणा मानव में थे । प्रेम तब भी आनन्द का कारक था और आज भी है । पानी के तत्वों की जानकारी के पहले भी उसका निर्माण  H2O के रूप में ही होता था । भौतिक विकास के फलस्वरूप इसके निर्माण का तरीका नहीं बदल सकता ।
सामाजिक भौतिक मूल्यों के निर्माण में भौगोलिक स्थितियां  (जिसमें पर्यावरण मुख्य है) मुख्य भूमिका निभाते हैं । आप पूरे संसार में एक से सामाजिक भौतिक मूल्यों की कल्पना  नहीं कर सकते पर हाँ शाश्वत मूल्य एक ही रहेगें । प्रेम की अभिव्यक्ति चाहे किसी भी भाषा में या बगैर भाषा के की जा जाए । चाहे कलम-दावत से की जाए,चाहे फेस बुक पर की जाए,प्रेम-प्रेम ही रहेगा । मांस खाने वाले को मांस खाने की जितनी स्वतंत्रता है और अपने विचारों के अभिव्यक्ति की जितनी स्वतंत्रता है,उतनी स्वतंत्रता तो आप शाकाहारी  को भी देना चाहेंगे ।
माँ जब तक गर्भ धारण करेगी,उसका बच्चे के प्रति वात्सल्य समाप्त नहीं होगा हाँ समय-काल-देश और पर्यावरण के अनुसार भाषा और तरीका अलग-अलग हो सकता है पर भाव में पृथकता मेरी समझ में सम्भव नहीं है,ऐसा मेरा विवेक कहता है । आप अपने विवेक के हिसाब से निर्णय लेने में स्वतंत्र है ।
"यत् जीवेत् सुखम् जीवेत्,ऋणम् कृत्वा घृतम् पीवेत् । भस्मीभूतस्य देह: पुर्नजन्म: कुत: ।"----चार्वाक ।
अर्थात् जब तक जिओ सुख से जिओ । यह देह तो चिताम में भस्म हो जायेगी । पुर्नजन्म किसने देखा है?
                    यह एक भौतिकवादी दर्शन है जो पाश्चात्य दर्शन से मेल खाता है जो खाओ-पिओ और मौज करो पर विश्वास करता है । भारतीय मनीषा इसके विपरीत है । इसको निम्न पंक्तियों से समझा जा सकता है ।
"एहि तन कर फल विषय न भाई,स्वर्गहु स्वल्प अन्त दुखदाई ।
नर तन पाइ विषय मन देहीं,पलट सुधा ते विष लेहीं ।
ताहि कबहुं भल कहहि न कोई,गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई ।"----मानस
अर्थात् इस मनुष्य शरीर का फल यह नहीं है कि उसे विषयों के भोग में लगाया जाए । स्वर्ग के सुख भी अल्प होते हैं और उनका अन्त दुखदाई होता है । नर तन पाकर उसे विषयों में लगाना इसी तरह है कि अमृत को छोड़ कर विष ग्रहण करना या पारस मणि को त्याग कर गुंजा (घुघुंची) को ग्रहण करना ।
अब यह तुम्हारे विवेक पर निर्भर करता है कि तुम्हें कौन सा मार्ग ग्रहण करना है ?
यह एक भौतिकवादी दर्शन है जो पाश्चात्य दर्शन से मेल खाता है जो खाओ-पिओ और मौज करो पर विश्वास करता है । भारतीय मनीषा इसके विपरीत है । इसको निम्न पंक्तियों से समझा जा सकता है ।
"एहि तन कर फल विषय न भाई,स्वर्गहु स्वल्प अन्त दुखदाई ।
नर तन पाइ विषय मन देहीं,पलट सुधा ते विष लेहीं ।
ताहि कबहुं भल कहहि न कोई,गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई ।"----मानस
अर्थात् इस मनुष्य शरीर का फल यह नहीं है कि उसे विषयों के भोग में लगाया जाए । स्वर्ग के सुख भी अल्प होते हैं और उनका अन्त दुखदाई होता है । नर तन पाकर उसे विषयों में लगाना इसी तरह है कि अमृत को छोड़ कर विष ग्रहण करना या पारस मणि को त्याग कर गुंजा (घुघुंची) को ग्रहण करना ।
अब यह तुम्हारे विवेक पर निर्भर करता है कि तुम्हें कौन सा मार्ग ग्रहण करना है ?

Tuesday, 20 December 2016

"कबिरा काजर रेख हू अब तो दई न जाय ।
नैना माहि तू बसै दूजा कहां समाय ?"---कबीर दास ।
कबीरदास जी कहते हैं कि अब तो आंखों  में काजर भी नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि आंखों में तो तू बसा हुआ है , वहां दूसरे के घुसने के लिए स्थान ही कहाँ है ?
अर्थात् जब जीव की आंखों में प्रभु का वास हो जाता है,तब उनकी आंखों में संसार का प्रवेश सम्भव नहीं है । या व्यक्ति जिस रंग का चश्मा लगा लेता है, उसे संसार, उसी रंग का दिखाई पड़ने लगता है । जिसकी आंखों में प्रभु का वास हो जाता है,उसे स॔सार की हर वस्तु में प्रभु के ही दर्शन होते हैं ।
"सीय-राम मय सब जग जानी,करहुं प्रणाम जोरि जुग  पानी ।" --तुलसीदास ।
मैं सारे संसार को सीता-राम का ही स्वरूप जान कर, अपने दोनों हाथ जोड़कर कर प्रणाम करता हूँ ।
इस स्थिति में पहुँच कर जीव के सारे द्वन्द्व समाप्त हो जाते हैं और वह परमानंद को प्राप्त हो जाता है । पर यह स्थिति प्रभु की कृपा से ही प्राप्त होती है ।
"अतिशय कृपा राम कै होई, सो यहि मारग पावै कोई ।"

Sunday, 18 December 2016

"जब 'मैं' था, तब 'तू' नहीं, अब 'तू' है, 'मैं नाहि ।
प्रेम गली अति सांकरी, या में  दुइ न समाय ।"
जब तक मैं यानि मेरा अहंकार मेरे साथ था, तब तक तू मेरे पास नहीं था और जब अब तू यानि हरि मेरे पास हैं तो मेरा मैं मेरे पास नहीं है । यह प्रेम की गली इतनी संकरी है कि इसमें दो समा ही नहीं सकते ।
भाव यह है कि जब तक जीव के अहंकार का पूर्णतया विगलन नहीं हो जाता तब तक वह प्रभु की कृपा का अनुभव नहीं कर पाता । इस अहंकार का कारण है जीव का कर्ता भाव । जब तक जीवन में सफलता मिलती रहती है, वह इसका कारण अपने को समझता रहता है और जब जीवन में असफलताएं मिलनी शुरू होती हैं,जैसे कि उच्चतम पद,अकूत धन,अपरमिति ज्ञान होने के बाद भी,वह जो चाहता है,वह नहीं हो पाता । तब धीरे- धीरे,उसके अहंकार का विगलन प्रारंभ हो जाता है और उसकी समझ में आने लगता है वह कर्ता नहीं है । जबकि वस्तुतः कर्ता वही है, क्योंकि जब तक निष्काम कर्म की स्थिति नहीं बनती,तब तक जीव को अपने ही कर्मों का फल भुगतना पड़ता है ।
"काहू न कोऊ सुख-दुःख कर दाता । निज कृत कर्म भोग सब भ्राता ।"
कोई किसी को सुख-दुःख नहीं देता । सब अपने कर्मों का ही फल भोगते हैं ।
विज्ञान भी यह कह कर कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है यानि कि प्रतिक्रिया (फल) क्रिया (कर्म) में ही निहित है,के द्वारा,वेदों में प्रतिपादित "कर्म सिद्धांत" की ही पुष्टि करता है ।
पर यह सब तभी समझ में आयेगा, जब जीव के अहंकार का  पूर्ण विगलन हो जायेगा और तब वह गा उठेगा "जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है ।" यानि मैं ही मैं हूँ क्यों कि तू के रूप में मैं ही हूँ । दूसरा तत्व है ही नहीं क्योंकि यह प्रेम गली अति संकरी है इसमें दूसरे के लिए स्थान ही नहीं है ।
इस स्थिति में पहुँच जाने के बाद ही,"अहं ब्रह्मास्मि","प्रज्ञानं ब्रह्म", "अयमात्मा ब्रह्म","तत्वमसि" इन वेद वाक्यों का अर्थ समझ में आयेगा ।अच्छा 
"जब 'मैं' था, तब 'तू' नहीं, अब 'तू' है, 'मैं नाहि ।
प्रेम गली अति सांकरी, या में  दुइ न समाय ।"
जब तक मैं यानि मेरा अहंकार मेरे साथ था, तब तक तू मेरे पास नहीं था और जब अब तू यानि हरि मेरे पास हैं तो मेरा मैं मेरे पास नहीं है । यह प्रेम की गली इतनी संकरी है कि इसमें दो समा ही नहीं सकते ।
भाव यह है कि जब तक जीव के अहंकार का पूर्णतया विगलन नहीं हो जाता तब तक वह प्रभु की कृपा का अनुभव नहीं कर पाता । इस अहंकार का कारण है जीव का कर्ता भाव । जब तक जीवन में सफलता मिलती रहती है, वह इसका कारण अपने को समझता रहता है और जब जीवन में असफलताएं मिलनी शुरू होती हैं,जैसे कि उच्चतम पद,अकूत धन,अपरमिति ज्ञान होने के बाद भी,वह जो चाहता है,वह नहीं हो पाता । तब धीरे- धीरे,उसके अहंकार का विगलन प्रारंभ हो जाता है और उसकी समझ में आने लगता है वह कर्ता नहीं है । जबकि वस्तुतः कर्ता वही है, क्योंकि जब तक निष्काम कर्म की स्थिति नहीं बनती,तब तक जीव को अपने ही कर्मों का फल भुगतना पड़ता है ।
"काहू न कोऊ सुख-दुःख कर दाता । निज कृत कर्म भोग सब भ्राता ।"
कोई किसी को सुख-दुःख नहीं देता । सब अपने कर्मों का ही फल भोगते हैं ।
विज्ञान भी यह कह कर कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है यानि कि प्रतिक्रिया (फल) क्रिया (कर्म) में ही निहित है,के द्वारा,वेदों में प्रतिपादित "कर्म सिद्धांत" की ही पुष्टि करता है ।
पर यह सब तभी समझ में आयेगा, जब जीव के अहंकार का  पूर्ण विगलन हो जायेगा और तब वह गा उठेगा "जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है ।" यानि मैं ही मैं हूँ क्यों कि तू के रूप में मैं ही हूँ । दूसरा तत्व है ही नहीं क्योंकि यह प्रेम गली अति संकरी है इसमें दूसरे के लिए स्थान ही नहीं है ।
इस स्थिति में पहुँच जाने के बाद ही,"अहं ब्रह्मास्मि","प्रज्ञानं ब्रह्म", "अयमात्मा ब्रह्म","तत्वमसि" इन वेद वाक्यों का अर्थ समझ में आयेगा ।

Friday, 9 September 2016


हमारी यह विडम्बना है कि हम भगवान को तो मानते हैं पर भगवान की नहीं मानते । भगवान गीता में स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि,
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानामं योगक्षेमं वहाम्यम् ।।"
जो अनन्य् चित्त होकर मेरी उपासना करते हैं,उनके भरण-पोषण और योग-क्षेम की जिम्मेदारी मैं स्वयं वहन करता हूँ ।
या रामायण में प्रभु राम कह रहे हैं,
"मोर दास कहाइ नर आशा । करहि तो काह मोर विश्वासा ।।"
अपने को मेरा भक्त कहते हो और आशा मनुष्यों से रखते हो तो फिर तो फिर तुम्हारा मुझ पर विश्वास ही कहाॅ रहा ?
हम सब की यही  स्थिति है ।जिन्दगी में संकट आने पर हम अपने धन,परिवार,समाज की ओर आशा भरी दृष्टि से निहारते  हैं । पर जब सब ओर से निराशा हाथ लगती है,तब गुरू या भगवान की याद आती है  ।
द्रौपिदी ने भगवान से बाद में पूंछा था कि चीरहरण के समय आपने आने में देर क्यों की ?तो कृष्ण ने यही उत्तर दिया कि पहिले तुमने अपने पर फिर पतियों पर फिर पितामह पर फिर समाज पर भरोसा किया ।जब सब ओर से निराशा हाथ लगी तब तुम को मेरी याद आई । जैसे ही तुमने मेरी याद की में तुरंत हाजिर हो गया ।

Friday, 22 July 2016

जीवन क्या है ?

जीवन उस नदी के समान है जो अपने रास्ते में आने वाली हर बाधा को मिटाती हुई,अपने उद्गम स्थल (सागर) की बॉंहों में समाहित होकर,अपने अस्तित्व को समाप्त कर,स्वंय सागर हो जाती है ।"आोम् पूर्णमद:,पूर्णमिदम्,पूर्णात्,पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य,पूर्णमादाय,पूर्णमेवावशिष्यते ।"आइए,हम भी,जीवन की इस निरन्तरता का,साक्षीभाव से आनन्द लें तो न राग होगा और न ही द्वैष । हम भी चारों तरफ़ केवल प्रभु(अस्तित्व) का ही दर्शन करते हुए,तुलसी की तरह गा उठेंगे,"सीय-राम मैं सब जग जानी,करहुं प्रनाम् जोरि जुग पानी ।" और सीताराम क्या है,"गिरा-अर्थ,जल-वीचि सम,कहियत भिन्न न भिन्न । वन्दउ सीताराम पद,जिन्हिह परम प्रिय खिन्न ।।" या जयशंकर'प्रसाद' की तरह,हम भी कह पड़ेगें,"हिमगिरि के उतंग शिखर पर बैठ सिला की शीतल छॉंह,एक पुरूष,भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह । नीचे जल था ऊपर हिम था,एक तरल था,एक सघन । एक ही तत्व की प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन ।।"

Sunday, 1 May 2016

मज़दूर दिवस पर

मज़दूर दिवस पर 
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"दुनिया के मज़दूरों एक हो जाओ क्योंकि तुम्हारे पास, खोने के लिए, दासता की ज़ंजीरों के अलावा कुछ भी नहीं है और पाने के लिए पूरा संसार पड़ा है ।"

छात्र जीवन में,इस वाक्य ने बहुत प्रभावित किया था । इसके बाद ११वर्षो तक राशनिंग विभाग में नौकरी करने के दौरान,ज़्यादातर तैनाती, कर्वी में रही । पाठा क्षेत्र और मानिकपुर के जंगलों में, काम करने वाले मज़दूरों की,ग़रीबी,लाचारी और बेबसी को बहुत नज़दीक से देखने का,महसूस करने का और कुछ न कर पाने की पीड़ा से गुज़रने का अवसर मिला । उस क्षेत्र के मज़दूर,राशन की दुकानों से केवल ज्वार और मिट्टी का तेल ही लेते थे,क्योंकि चीनी,गेहूँ और अन्य कुछ भी लेने की उनकी सामर्थ्य ही नहीं थी । मानिकपुर,बहिलपुरवा के जंगल सें लकड़ी काटना,गठ्ठर बनाना और उसे दूसरे दिन कर्वी,अतर्रा,बाँदा तक लाकर बेचना यह उनकी जीविका का मुख्य साधन था । यह सारा काम ज़्यादातर महिलाएँ ही करती थीं और उनका शोषण का क्रम जंगल से ही प्रारम्भ हो जाता था । जंगल विभाग के कर्मचारी,इसके बाद सिविल पुलिस के कर्मचारी और फिर रेलवे विभाग, इन सब का पेट भरने के बाद,उनके पास,पूरी ज़लालत भोगने के बाद,दो दिन के श्रम का मूल्य २ या ३ रुपये ही बचता था,जिसमें उन्हे अपना पूरा परिवार पालना था । यह बात मैं वर्ष १९७४ की बता रहा हूँ । पर यह शोषण अब भी बदस्तूर जारी है,अन्तर केवल इतना है कि जो गठ्ठर उस समय ४ रुपये में बिकता था,अब वह ५०-६०रुपये में बिकता है,बाकी का अनुपात वही है ।

इसके बाद २७ वर्षों तक श्रम विभाग में सेवा के दौरान, विभिन्न क्षेत्रों के श्रमिकों के व्यापक शोषण के जो नज़ारे देखने को मिले,यदि उनका वर्णन करने बैठूँ तो उसे पढ़ने का आपके पास समय ही नहीं होगा । एक विचित्र अनुभव यह भी हुआ कि कहीं-कहीं पर,ट्रेड यूनियन भी,इस शोषणवादी व्यवस्था को पुष्ट करने में,सकारात्मक भूमिका निभाती हुई पायी गयीं । इस व्यवस्था को बदलना तो मेरे बस में नहीं था,पर व्यवस्था के अन्दर रहकर,जितना इस शोषण को कम करने में, मैं अपनी भूमिका का निर्वहन कर सकता था,मैंने किया और इसका मुझे सन्तोष है ।

सेवानिवृत्त होने के बाद की एक घटना बता कर,अपना आलेख समाप्त करूँगा । घटना यह है कि मैं गुजरात में,रोटरी क्लब द्वारा आयोजित,इस समय के एक बड़े संत के कार्यक्रम में उपस्थित था । उन संत महोदय ने कार्यक्रम में उपस्थित लोगों से जो समाज के समृद्ध वर्ग का प्रतिनिधित्व करता था,से कहा कि उन्हे अपने लाभ का १०% अच्छे कार्यों में लगाना चाहिए,इसका उन्हे पुण्य प्राप्त होगा । इसके बाद प्रश्नोत्तर का कार्यक्रम था । मैनें बाल्मीकि रामायण में पढ़ा था कि जब भरत दशरथ की मृत्यु के बाद नौनिहाल से वापिस आते हैं तो कौशल्या से मिलने के लिए जाते हैं और वह कौशल्या माता से कहते हैं कि राम के वनगमन में यदि उनकी ज़रा भी भूमिका हो तो उन्हे यह- यह पाप लगें । यह प्रसंग रामचरितमानस में भी है,पर उसमें जिस पाप का ज़िक्र मैं करने जा रहा हूँ,वह शामिल नहीं हैं और वह पाप यह है कि किसी श्रमिक से मज़दूरी करा लेने के बाद,उसे पर्याप्त मेहनताना न देने से जो पाप लगता है । पहिले मैंने सोचा कि जो प्रश्न मेरे मन में उठ रहा है,उसके पूछनें का यह उपर्युक्त समय नहीं है फिर मैनें सोचा कि इस प्रश्न को न पूंछकर मैं अपनी आत्मा के साथ न्याय नहीं कर पाऊँगा ।
प्रश्न :- मान्यवर जिस लाभ के १०% के दान करने पर पुण्य मिलने की बात आपने कही है वह लाभ यदि श्रमिकों को निर्धारित वेतन से कम वेतन देकर या अन्य अनुचित संसाधनों का प्रयोग करके अर्जित किया गया हो तो क्या उसके दान,का भी पुण्य,दाता को प्राप्त होगा ?
उत्तर :- यह दान उत्तम कोटि में तो नहीं आयेगा फिर भी उसको कुछ न कुछ पुण्य तो मिलेगा ही,यदि इस धनराशि को अच्छे कार्यों में प्रयोग किया जाये तो ।

Sunday, 6 March 2016

महाशिवरात्रि पर

महाशिवरात्रि पर
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आज शिव और पार्वती का विवाह पर्व है, जिसे पूरा देश उल्लास, श्रद्धा और विश्वास के साथ मना रहा है । इस पर्व पर मैं सभी को अपनी शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ । 

रामचरितमानस के बालकाण्ड के द्वितीय श्लोक में, तुलसीदास जी ने माता पार्वती और भगवान शिव को, श्रद्धा और विश्वास के रूप में प्रतिस्थापित किया है । इस युग्म के बग़ैर यानि कि जीवन में श्रद्धा और विश्वास के अभाव में, आप अपने अन्दर स्थित ईश्वर या अपने आत्मस्वरूप का दर्शन नहीं कर सकते, भले ही आपने भौतिक सिद्धियों की उपलब्धि क्यों न कर ली हो ?

"भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ
 याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वान्त:स्थमीश्वरम्"
(श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप श्री पार्वतीजी और श्री शंकरजी की मैं वन्दना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन अपने अन्त:करण में स्थित ईश्वर को नहीं देख सकते ।)

आइए श्रद्धा और विश्वास के इस विवाह पर्व पर हम भी संकल्प लें कि हम भी अपने जीवन में इनका अवतरण करें जिससे हम भी अपने आत्मस्वरूप का दिग्दर्शन कर सकें ।

Tuesday, 1 March 2016

जीवन और मृत्यु के बीच की न भूलने वाली शान्ति ।

जीवन और मृत्यु के बीच की न भूलने वाली शान्ति ।
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आज से लगभग ४५ वर्षों पूर्व भी जीवन में एक रात्रि ऐसी ही आयी थी, जब मेरे शरीर में नाम मात्र का रक्त शेष रह गया था । रक्त की अल्पता के कारण डाक्टर द्वारा, मुझे सुलाने के लिए दिया जाने वाला मर्फिया का इंजेक्शन भी बेअसर हो गया था और मैं पूरी रात चेतन और अचेतन के झूले में झूले में झूलता रहा था । स्थानीय डाक्टरों ने एक तरीक़े से जवाब दे दिया था और शीघ्रताशीघ्र कानपुर ले जाने की सलाह दी थी । उस समय सुबह की पैसेन्जर के पहिले कानपुर जाने का कोई साधन नहीं था । पूरी रात जब भी चेतना वापिस आती थी तो देखता था कि पूरा परिवार मेरी चारपाई के चारों ओर इकट्ठा है, सबकी ऑंखों से अश्रुपात हो रहा है । मैं उन्हे आश्वस्त करता था कि घबड़ाओ नहीं ! अभी मैं मरुंगा नहीं ! इतना कहते-कहते मैं शून्य में पहुँच जाता था और एक अवर्णनीय शान्ति के सागर में डूब जाता था । मुझे लगता था कि जब मृत्यु में इतनी शान्ति है तो आदमी मृत्यु से इतना घबड़ाता क्यों है ?

इतने वर्षों बाद विगत २७ जनवरी को ऐसी ही विराट शान्ति का सुखद अनुभव तब हुआ जब ह्रदय की तीन धमनियों की गड़बड़ी के कारण एक अतिरिक्त धमिनी से रक्त को मार्ग देने के लिए, मुझे शल्य चिकित्सा हेतु, शल्य कक्ष में ले जाया जा रहा था और मैं एक अखण्ड शान्ति में डूबा हुआ, अपने आराध्य से मन ही मन प्रार्थना कर रहा था कि मेरी इस शान्ति को चिर शान्ति में परिवर्तित कर दे । कहीं कोई उद्विग्नता नहीं, शरीर छूटने का कोई भय नहीं । बार-बार एक ही विचार दृढ़ होता जा रहा था कि जब इस शरीर द्वारा संसार में आने का मुख्य उद्देश्य ही पूरा नहीं हो पा रहा है, यानि कि आवागमन से मुक्ति के मार्ग पर नहीं चल पा रहा हूँ तो फिर इस शरीर को रखने का औचित्य क्या है ? एक बार मन में एक विचार और आया कि मान लो भगवान ने मेरी प्रार्थना न सुनी, तब ?यह तब जैसे ही आया, उसी क्षण मन ने संकल्प लिया कि यदि ऐसा हुआ तो शेष जीवन आवागमन से मुक्ति के प्रयास में ही गुज़ारूँगा ।

मेरे प्रभु ने मेरी प्रार्थना नहीं सुनी । मैं वापिस आ गया हूँ । यह तो भविष्य ही बताएगा कि मेरे प्रभु ने मेरे शेष भोंगों को भोगने के लिए, मेरी प्रार्थना अस्वीकार की है या फिर उस अकारण करुणावरुणालय ने करुणा करके मुझे अपने में समाहित करने का एक शुभ अवसर और प्रदान किया है ।

शेष प्रभु कृपा ।

Thursday, 31 December 2015

नव-वर्ष के आगमन पर ।

"सीय-राम मय सब जग जानी । करहुं प्रणाम जोरि जुग पानी ।।"
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२०१५ की विदाई और २०१६ के स्वागत् में, आप सब में, अपने आराध्य सिया-राम का ही निवास मानते हुए, आपके श्रीचरणों में करबद्ध प्रणाम करते हुए, निवेदन करता हूँ कि आप सब ह्रदय से मुझे आशीर्वाद दे कि नव-वर्ष में, मेरी गर्दन,जो, रूढ़ियों, परम्पराओं और जन्मो-जन्मो के संस्कारों के अंहकार के कारण, झुकना भूल गयी है और हर समय अकड़ी रहती है, को अपने मूल स्वरूप की स्मृति आ जाए और वह ज़रा सा झुक जाए जिससे मैं अपने यार (आराध्य) के दीदार करने में सफल हो सकूँ ।

"दिल में छुपा के रक्खी है, तस्वीरे यार की ।
ज़रा सा गर्दन झुकाई, देख ली ।।"

Tuesday, 15 December 2015

शास्त्रों की जीवन में उपयोगिता ।

स्थान - अपर-श्रमायुक्त कार्यालय, कानपुर (उ०प्र०) में चल रही क्षेत्रीय श्रम अधिकारियों की मासिक बैठक ।
वर्ष - १९९३
दृश्य प्रथम :- हर मासिक बैठक की तरह, अपर-श्रमायुक्त महोदय, अधीनस्थो की मिजाजपुर्सी अपने स्वाभावानुसार  (जिसमें अशालीन् शब्दों का प्रयोग स्वाभाविक गति से करना अनिवार्य था और जिसके कारण रक्तचाप से पीड़ित अधीनस्थ,रक्तचाप की दुगनी मात्रा में औषधि लेकर ही, बैठक कक्ष में प्रवेश का साहस कर पाते थे ।) करके हल्के मूड में आ चुके थे ।

दृश्य द्वितीय :- चाय-नास्ते का दौर,पूरी उन्मुक्तता के साथ, चलायमान था कि तभी एक अधीनस्थ ने एक अक्षम्य अपराध कर डाला और उसका अक्षम्य अपराध यह था कि उसने पूर्व अधिकारी के श्रम क़ानूनों के गहन ज्ञान की प्रशंसा करने की गुस्ताखी कर डाली थी ।

दृश्य तृतीय :- "क्या बकवास कर रहे हो ? किस नीच की प्रशंसा कर रहे हो ? वह साला जिसको रोज़ शराब,कबाब और शबाब चाहिए, उसे तुम ज्ञानी बता रहे हो लगता है तुम भी सरुऊ उसी लाइन के हो । जाओ उसी के पास,यहॉं हमारे पास क्या कर रहे हो ? साला टिकियाचोर को ज्ञानी बताता है ।" अधीनस्थ सिर झुकाए मन ही मन सोच रहा था कि यह हो क्या गया ? उसने बहुत कोशिश की पर ज्ञान और शराब,कबाब,शबाब के अन्तर-सम्बन्धों की गुत्थी सुलझाने में सफल न हो सका । उसकी दृष्टि समाधान की तलाश करती-करती मेरे चेहरे पर आ टिकी । मेरे चेहरे पर स्मित हास्य का लास्य देख कर, वह तिलमिला गया पर वातावरण ऐसा था कि उसके पास ख़ून का घूँट पीकर,बैठक के ख़त्म होने के इन्तज़ार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था ।

दृश्य चतुर्थ :- मैं बैठक समाप्ति के बाद अपने कक्ष में ठीक से बैठ भी नहीं पाया था कि वह धड़धड़ाते हुए आया और रोष के साथ बोला,"आपके हास्य का कारण जानने आया हूँ ? आपसे मुझे इस व्यवहार की उम्मीद नहीं थी ।" मैंने कहा,यार बैठो तो सही ।कारण भी बताऊँगा और तुमको कुछ मिष्ठान्न भी खिलाऊँगा । मिष्ठान्न उसकी कमज़ोरी थी यह मुझे मालूम था । मिष्ठान्न के नाम से उसका पारा कुछ नीचे आया । मिष्ठान्न खाते-खाते वह सामान्य हो गया था । तब मैंने उससे कहा कि अगर तुमने बाल्मीकि रामायण का परायण किया होता तो तुमने यह ग़लती न की होती, जिसके कारण बैठक में तुम्हें ज़लील होना पड़ा ।वह फिर उखड़ने लगा और बोला कि क्या ज्ञानी की प्रशंसा करना अपराध है और इस घटना का बाल्मीकि रामायण से क्या सम्बन्ध है ? मैंने कहा प्रशंसा करना अपराध नहीं है पर प्रशंसा के लिए, पात्र,काल और परिस्थिति का ज्ञान होना आवश्यक है और इस ज्ञान का सम्बन्ध बाल्मीकि रामायण से है । राम वन गमन के प्रसंग में दो-तीन श्लोकों में राम सीता को समझाते हुए कह रहे हैं कि सीते मेरे वन  गमन के पश्चात् तुम मेरी चर्चा से बचना और मेरी प्रशंसा तो कदापि मत करना क्योंकि सत्ता में बैठा हुआ व्यक्ति अपने समक्ष दूसरे की प्रशंसा  सहन नहीं कर पाता ।यहसुनकर वह हँसते हुए चला गया और मैंने चैन की सॉस ली ।