Saturday, 30 July 2011

दिन जल्दी जल्दी ढलता है


बच्चन जी के गीत की यह पंक्तियाँ "दिन जल्दी जल्दी ढलता है, हो जाये न पथ में रात कहीं, मंजिल भी तो है दूर कहीं ,यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी जल्दी चलता है , दिन जल्दी जल्दी ढलता है " आज बहुत शिद्दत के साथ याद आ रही है | वर्ष १९७३ से शुरू नौकरी का यह सफ़र आज समाप्त हो गया | ऐसा लगता है कि नौकरी का सफ़र तो समाप्त हो गया पर मानव जीवन का सफ़र तो अभी प्रारंभ ही नहीं हुआ मंजिल तो बहुत दूर है, पथ में रात होने का खतरा तो सामने खड़ा है |कितना  भी तेज चलूँ , लगता नहीं कि मंजिल तक पहुँच पाऊँगा | पर तभी प्रभु का गीता में दिया गया यह आश्वासन "नेहाभिक्रमनाशोअस्ति  प्रत्यवायो न विद्यते , स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् " संबल प्रदान कर जाता है कि कम से कम इस जन्म में इस पथ में चल तो पड़ा हूँ , न इस जन्म में सही ,किसी न किसी जन्म में तो मंजिल तक पहुँच ही जाऊँगा | दो कदम भी इस पथ पर चल लिया तो इस जन्म में मंजिल दो कदम नज़दीक तो आ ही जाएगी |
 शेष प्रभु कृपा |

Friday, 29 July 2011

मैं तो कुत्ता राम का मोतिया मेरा नाम

मैं  तो कुत्ता  राम का मोतिया मेरा नाम | यह कबीर के दोहे का एक भाग है | यह एक भक्त के सम्पूणॆ समर्पण की स्थिति है | अपने प्रभु की इच्छा का ही पालन | कुत्ते की तरह अपने प्रभु का अनुसरण करना | गीता का यह श्लोक "सर्व धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणम् व्रज, अहम् त्वाम् सर्व पापेभ्यो मोक्षष्यामि मा शुचः" जिसमे प्रभु डिंडिम घोष करते हैं कि यह जीव सब कुछ छोड़कर केवल मेरी शरण मे आ जाये तो मैं उसे सारे पापो सें मुक्त कर दूंगा | प्रभु के इस स्पष्ट कथन के बाद भी जीव इस पर विश्वास नहीं करता | हम भगवान पर तो विश्वास करते हैं किन्तु भगवान की वाणी पर या शास्त्र पर नहीं | यही मानव जीवन की विडम्बना है | "जाही विधि राखे राम ताही विधि रहिये, सीता राम सीता राम कहिये " जीव का इस स्थिति  में पहुँचना ही अपने प्रभु का कुत्ता हो जाना है | और जब आप यहाँ तक पहुँच जायेंगे तब आपकी चिंता भगवान  खुद करेंगे | समर्पण जब इस सीमा तक हो जाता है तब मालिक या प्रभु आपसे विमुख रह ही नहीं सकते |अपने जीवन की एक घटना  इस संबंध में बताना चाहूँगा मेरे अधिकारी मुझसे नाराज थे,उसी समय मेरी मुलाकात एक संत से हुई । मैने उनसे अपनी समस्या बताई तो उन्होंने कहा कि तुम्हारे समर्पण मे कमी है | मैने उनका प्रतिवाद करना चाहा तो उन्होने पूरी दृढ़ता से कहा कि यह संभव ही नहीं है कि समर्पण पूरा हो और सामने वाला नाराज रह सके, कहीं न कही कोई कमी जरुर है | उनका यह कथन लौकिक और पारलौकिक, दोनों जीवन पर पूरी तरह सटीक बैठता है | जीवन में एक बार इस बात को उतार कर देखो , जीवन सार्थक हो जायेगा | जब तक किनारे बैठकर लहरों को देखते रहोगे तब तक न तो तैरना सीख पाओगे और न ही प्रभु की शीतलता रूपी कृपा का ही अनुभव कर सकोगे | एक बार, केवल एक बार अपने को लहरों को सौंप कर देखो । निश्चिंत रहो , लहरें तुम्हे  अपनी बाहोँ मे लेकर ,तुम्हे झूले का आनन्द देती किनारे तक अवश्य पहुँचा देंगी |
शेष प्रभु कृपा |

Monday, 25 July 2011

सियाराम मैं सब जग जानी ,करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी



सियाराम मैं सब जग जानी ,करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी
पूरे संसार में अपने आराध्य के ही दर्शन करना, बिना अहंकार के विगलन के संभव ही नहीं है |विनय पत्रिका के एक पद में मोह दसमौलि तदभ्रात अहंकार को कहा गया है | अथॊत् रावन मोह का प्रतीक है, कुम्भकरण अहंकार का प्रतीक है | इसी में आगे मेघनाथ को काम का प्रतीक कहा गया है|  मेघनाथ का वध लखनलाल द्वारा किया जाता है तथा रावन और कुम्भकरण का वध श्रीराम द्वारा किया जाता है | लखनलाल को जीवों का आचार्य कहा गया है,यानि लखनलाल जीव के प्रतीक है |  जीव काम पर तो विजय प्राप्त कर सकता है पर मोह और अहंकार केवल प्रभु द्वारा ही नष्ट किये जा सकते हैं | अथॊत अहंकार का विगलन प्रभु की कृपा से ही संभव है, पुरूषार्थ से नहीं । प्रभु की कृपा से जब अहंकार का विगलन हो जायेगा तब जीव "सब प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं विरोध " की भावभूमि पर पहुँच पायेगा | और यह संभव हो पायेगा प्रभु श्रीराम की कृपा से । इसलिए "सुमिरिअ रामहिं गायहिं रामहिं " को जीवन में उतार लिया जाये तो जीवन सार्थक हो जायेगा |
शेष प्रभु कृपा |