- जीवन में जब तक लक्ष्य सामने रहता है, जीवन गतिशीलता से परिपूर्ण रहता है, उत्साह से लबालब रहता है और नये-नये विचारों के अवागमन से आहलादित रहता है, पर जैसे-जैसे जीवन के लक्ष्य, एक-एक कर पूर्णता को प्राप्त करने लगते हैं, जीवन उद्देश्य हीन हो जाता है, न तो जीवन में उत्साह रह जाता है, न रस रह जाता है और जीवन एक बोझ लगने लगता है |
- इस समय मैं इसी मानसिकता से गुजर रहा हूँ | भाई पहाड़िया जी के एक गीत का यह बंद बहुत याद आता है जो शायद इसी मानसिकता की अभिव्यक्ति करता है,
- "अपने कमरे में बैठो, अपने आकाश गहो
- और किसी के नहीं विकल मन,अपने पास रहो |
- अपनी पीड़ा,अपने सुख-दुःख,अपने त्रास सहो |"
- मैं प्रात: भ्रमण के समय, मन ही मन इस भजन को रोज दोहराता हूँ, पर जीवन में नहीं उतार पाता खासकर यह पंक्तियॉं,
- "सुत,वनितादि जानि स्वारथ रत, न करु नेह सबही ते |
- अन्तहि तोहि तजेगें पामर,तू न तजहि अब ही ते |
- मन पछितैहैं अवसर बीते ||"
- मैंने इस जीवन की कभी कल्पना ही नहीं की थी | सांसारिक द्रष्टि से मैं एक भाग्यशाली व्यक्ति हूँ | कोई भी परिचित-अपरिचित व्यक्ति यह मानने के लिये तैयार ही नहीं होगा कि इतनी भौतिक उपलब्धियों के बाद भी कोई व्यक्ति इतना अशांत हो सकता है |यही मेरे जीवन की विडम्बना है|मेरे अंदर कभी-कभी ऐसे झंझावात चलते है, लगता है कि मेरा अस्तित्व ही उड़ता जा रहा है, एक अनजाने गंतव्य की ओर एक अनजान दिशा में और कभी-कभी ऐसा लगता कि मेरे चारो तरफ भीड़ है और इस भीड़ के बीच मैं अकेला खड़ा हूँ, एकदम अकेला और मेरे अंदर पसरा हुआ है, एक कभी न समाप्त होने वाला गहरा सन्नाटा, एक ऐसी वीरानगी जिसमें मेरा दम घुटता जा रहा है | मैं अपने गोलोक वासी गुरु, अपने प्रभु से नित्य यही प्रार्थना करता हूँ कि या तो मेरे जीवन को दिशा दो, एक जीने का उद्देश्य दो या पहिले की तरह भजन में डूब जाने की सामर्थ्य दो और यदि तुम मुझे इसका पात्र नहीं समझते तो इस उद्देश्यहीन जीवन से मुझे मुक्ति दो | अब इस उद्देश्यहीन जीवन के दंश मुझसे झेले नहीं जाते |
Monday, 17 November 2014
उद्देश्य हीन जीवन के दंश |
Friday, 17 October 2014
दीपावली पर
अपने मित्र भाई बाबूलाल " विद्रुम " की करीब ४२ बरसों पूर्व लिखा एक गीत का मुखड़ा याद आ रहा है :- "जाने कितनी दीपावलियां देखी, जाने कितने दीप सजाये गहन अमा में मेरे उर का, दीप जला दो तो, मैं जानू " अपने एक दूसरे मित्र भाई मोजेस माइकिल के इतने ही पुराने गीत का एक बंद कुछ इस प्रकार है :- "जब माथे, बेंदी सुहाग की, दमक रही होगी जब कोई मनचली सहेली, छेड़ रही होगी नयना जब उनसे मिलने को आतुर हों,तब मैं पलकों में बस रहूँ तो मेरा पागलपन होगा तुमको अपना कहूं तो मेरा पागलपन होगा " अपने एक तीसरे मित्र भाई राजबल्लभ त्रिपाठी के उसी समय के गीत का बंद इस प्रकार है :- "जितनी बड़ी जिंदगी है, उतने बड़े ग़म सहने को ज्यादा है, कहने को कम दूर रहा अपना वह छोटा सा गांव मेरे मन अब उससे क्या भला लगाव पीछे यूं मुड़ने की बात नहीं ठीक ये तो थे बेमाने सफ़र के पड़ाव कौन पुकारेगा जो रुक जायें हम सहने को ज्यादा है कहने को कम " सन १९७६ में लिखा गया अपना यह गीत भी याद आ रहा है :- "मानस की चौपाई सी याद तुम्हारी आई अंतस के सूनेपन में गूँज उठी शहनाई कोने में दुबक गया संशय का सर्प आँखों में बिहँस गया मनुहारा दर्प गर्मीली दोपहरी ने अँगुली चटकाई मानस की चौपाई सी याद तुम्हारी आई पूजा की थाली सा महक उठा तन नदिया की मछली सा उछल पड़ा मन श्रमहारी संध्या ने आरती सजाई मानस की चौपाई सी याद तुम्हारी आई " यह सब आज बहुत याद आ रहे हैं । बाबूलाल भाई ने तो गहन अमा में अपने उर का दीपक तो, प्रभु कृपा से, विनोबाभावे के निर्देशन में, इस तरह से जलाया कि उसके आलोक से आसाम और मेघालय के जंगलों में रहने वाली जनजातियों के हजारों-हजार घर, देदीप्यमान हो रहे हैं और इस तरह से उन्होंने अपना जीवन सार्थक कर लिया । भाई मोजेस का पागलपन, तलाशता रहा कन्धों को, जो उसके पागलपन के बोझ को उठा सकें, काफ़ी भटकने के बाद, उनकी तलाश पूरी हुई और अब चार कंधे मिलकर, खींच रहे है उस बैलगाड़ी को जिसमें तीन सवारियां बैठी हुई है । चिकनाई के अभाव में गाड़ी खींचने में शोर बहुत होता है और ताकत भी बहुत लगानी पड़ती है । बीच-बीच में कोई प्रकाशक थोड़ी-थोड़ी चिकनाई डालता रहता है जिससे गाड़ी चलती रहे और उसकी थाली में कटोरियों की संख्या में इजाफा होता रहे । भाई इस चक्कर में है कि कब सवारियों की मंजिल आवे और उसे कुछ आराम मिले । सवारियां भी गाड़ी से उतर-उतर कर धक्का देती रहती है जिससे दोनों बैलों को कुछ आराम मिल सके । इस पर्व पर माँ लक्ष्मी से यही प्रार्थना है कि वह अपने इस अनोखे पुत्र, जिसने पूरे जीवन अपने सिद्धांतो से समझौता नहीं किया, पर अब कृपा करें, जिससे इसी तरह की जिंदगी जीने वाले अन्य पुत्रों का मनोबल न टूटने पाये । भाई राजबल्ल्भ अपनी जिन्दगी के ग़मों को भुलाने के लिये ऐसे दरिया में उतरे जहाँ से आज तक कोई वापिस नहीं आया । वे जहां भी हो, प्रभु उनको शान्ति दे । जहां तक अपना प्रश्न है ? प्रभु और स्वामी जी के असीम अनुग्रह के कारण, भौतिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने का जहां एक तरफ संतोष है वहीं दूसरी ओर स्वामी जी के बाद, जीवन के लक्ष्य से भटकाव की पीड़ा से भी गुजर रहा हूँ । आज के दिन प्रभु से यही प्रार्थना है कि या तो मेरे मन को संसार से हटाकर अपनी ओर मोड़ लें, जिससे मानव जीवन सार्थक हो सके या फिर अपने चरणों में स्थान दे दे ।
जौ बालक कछु अचगर करहीं, गुरु,पितु,मातु मोद मन भरहीं
जब बच्चे छोटे होते हैं और कुछ ऊट पटांग हरकते करते है तो उनकी हरकते देखकर, गुरु, पिता और माता का मन प्रसन्नता से भर जाता है और वे आने-जाने वालों को भी उनकी हरकते बता कर अपनी प्रसन्नता को दुगणित कर लेते है । माता-पिता बच्चों का इंतजार करते है कि कब वह विद्यालय से वापिस आवें और अपनी दिन भर की कारगुजारियों को उन्हें बतायें जिसे सुनकर वे प्रसन्न होते हैं । माता-पिता भले ही कितने व्यस्त क्यों न हो पर बच्चों की तोतली और निरर्थक बातें, सुनकर मन को प्रसन्न और हल्का करने का समय वे निकाल ही लेते हैं । पर वही बच्चे जब खुद माता-पिता बन जाते हैं तो वह भी इतिहास को दोहराते है पर एक इतिहास दोहराना वह भूल जाते है । वह यह भूल जाते है कि उनके माता-पिता ने जितना समय उन्हें दिया था, उतना ही समय उन्होंने अपने माता-पिता को भी दिया था । मुझे अच्छी तरह याद है कि मेरे एक मित्र की माताजी जब स्कूल से थकी-हारी घर आती थीं तो मेरा मित्र हम लोगो को छोडकर तुरंत बाहर की तरफ भागता था और अपनी माँ को पकड़कर कमरे में हम लोगो के पास बिठाकर, यह कहते हुए कि माँ आप बहुत थकी हुई लग रहीं है, आप बैठिये मैं आपके लिए चाय बनाकर लाता हूँ । माँ अंदर तक भीग जाती थी अपने पुत्र के लाड़ पर । आज स्थिति यह है कि तीन पीढ़ी एक साथ रह नहीं पाती । इसके बहुत सारे कारण हैं । कहीं पर आर्थिक मज़बूरी है, कहीं पर स्थान की दूरी है, कहीं पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता का भाव है, कहीं पर प्रेम का अभाव है, कहीं पर तेज भाग रही जिंदगी में और हर पल बद ल रही आधुनिकता में, पीछे न छूट जाने का भय है तो कहीं समाज का अभय है । खैर कारण कोई भी हो पर यह आज के समय का कटु सत्य है कि तीन पीढियां एक साथ नहीं रह पाती । कुछ अपवादों की बात अलग है । स्वस्थ समाज के लिए यह स्थिति बहुत अच्छी नहीं है । यदि आप गंभीरता से अपने आस-पास अवलोकन करें तो आप यह पायेगें कि तीनो पीढियां इस दंश से बुरी तरह छटपटाने के बाद भी, समाधान के प्रति उदासीन है। समाधान के लिये जिस त्याग और उदारता की आवश्यकता होगी, उसकी तलाश इस भौतिकवादी समाज में करना, मृगमरीचिका होगी ।
Friday, 23 August 2013
आने वाले खतरे से अनजान पीढ़ी
कई महीनों से मन न तो कुछ देखना चाहता है, न कुछ सुनना चाहता है और न ही कुछ लिखना चाहता है, न कुछ समझना चाहता है और न ही कुछ समझाना चाहता है । एक अजीब सा सूनापन, एक अजीब सी रिक्तता जीवन में आ गयी है । जीवन निरर्थक लगने लगा है । उद्देश्यहीन, उत्साहहीन जीवन अपनी नियति बनता जा रहा है । रामायण और गीता का पाठ जहाँ पहिले अन्दर तक सिक्त कर देता था वहाँ अब मात्र समय काटने का वाचिक उपक्रम मात्र बन कर रह गया है । पत्नी कभी-कभी हँसी में कह देती है कि स्वामीजी की बीमारी के समय बहुत शिकायत करते थे कि दो वर्षों से कहीं जा नहीं पाये । स्वामी जी ने तुम्हे अपने बंधन से मुक्त कर दिया, अब उनके जाने के बाद से लगातार घूम ही रहे हो, अब क्यों मन नहीं लगता ? जब कि वह जानती है कि इसका कारण स्वामीजी का विष्णुलोक गमन ही है | उसी की प्रेरणा से आज फिर से आपसे मुखातिब हूँ ।
मैं आधुनिकता का विरोधी नहीं हूँ और यदि विरोधी होऊं, तब भी समय को रोकना किसी के वश में नहीं है । हर आने वाली पीढ़ी, पुरानी पीढ़ी से ज्यादा आधुनिक होती है । पीढ़ी बदलने के साथ सामाजिक तथा नैतिक मूल्य भी बदलते हैं, यह भी ध्रुव सत्य है । पुरानी पीढ़ी, नई पीढ़ी का विरोध करे, इसे भी मैं सही नहीं समझता । बेहतर यही होता है कि वह सामंजस्य स्थापित करे । हाँ इसके साथ-साथ मैं यह भी आवश्यक समझता हूँ कि जहाँ उसे लगे कि उसका चुप रहना, उसे अपनी ही नजर में गिराने लगा है तो उसे अपनी चुप्पी तोड़कर अपनी बात कह देना चाहिये नहीं तो वह स्वयं अपराधबोध से ग्रसित हो जायेगा । इसके साथ-साथ मैं यह भी कहना चाहूंगा कि उसे अपने को मानसिक अवसाद से बचाने के लिये, अपनी बात को कहने का अधिकार तो है पर उस बात को मानने का आग्रह रखना, नए मानसिक अवसाद को निमंत्रित करना होगा, अत: इससे बचना चाहिये । हमारे शास्त्र, हमारा लोक साहित्य एवं पुरातन वांग्मय हमेशा से इस बात को कहता रहा है कि व्यक्ति जिस प्रकार का भोजन करेगा, जिस प्रकार का साहित्य पढ़ेगा, जिस प्रकार के दृश्य देखेगा, जिस प्रकार का संग करेगा, जिस प्रकार का चिंतन करेगा, वैसा ही उसका मन बनेगा । हमारी पौराणिक कथाएँ इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं कि जीव के संस्कारों का निर्माण माँ के गर्भ से ही प्रारंभ हो जाता है ।
अब इन्ही सब तथ्यों को आधुनिक विज्ञान भी पूरी तरह से प्रमाणित कर रहा है, फिर भी वर्तमान पीढ़ी इन तथ्यों से पूरी तरह आँख मूंदे हुए है । जो सोया हुआ हो,उसे तो जगाया जा सकता है पर जो सोने का नाटक कर रहा हो, उसे कौन जगा सकता है ? अपने को अत्याधुनिक प्रदर्शित करने के चक्कर में वह क्या खो रहे हैं ? जब तक इस तथ्य का साक्षात्कार उन्हें होगा तब तक बहुत देर हो चुकी होगी । फिर पछतावे के अलावा क्या बचेगा ?
मैं आधुनिकता का विरोधी नहीं हूँ और यदि विरोधी होऊं, तब भी समय को रोकना किसी के वश में नहीं है । हर आने वाली पीढ़ी, पुरानी पीढ़ी से ज्यादा आधुनिक होती है । पीढ़ी बदलने के साथ सामाजिक तथा नैतिक मूल्य भी बदलते हैं, यह भी ध्रुव सत्य है । पुरानी पीढ़ी, नई पीढ़ी का विरोध करे, इसे भी मैं सही नहीं समझता । बेहतर यही होता है कि वह सामंजस्य स्थापित करे । हाँ इसके साथ-साथ मैं यह भी आवश्यक समझता हूँ कि जहाँ उसे लगे कि उसका चुप रहना, उसे अपनी ही नजर में गिराने लगा है तो उसे अपनी चुप्पी तोड़कर अपनी बात कह देना चाहिये नहीं तो वह स्वयं अपराधबोध से ग्रसित हो जायेगा । इसके साथ-साथ मैं यह भी कहना चाहूंगा कि उसे अपने को मानसिक अवसाद से बचाने के लिये, अपनी बात को कहने का अधिकार तो है पर उस बात को मानने का आग्रह रखना, नए मानसिक अवसाद को निमंत्रित करना होगा, अत: इससे बचना चाहिये । हमारे शास्त्र, हमारा लोक साहित्य एवं पुरातन वांग्मय हमेशा से इस बात को कहता रहा है कि व्यक्ति जिस प्रकार का भोजन करेगा, जिस प्रकार का साहित्य पढ़ेगा, जिस प्रकार के दृश्य देखेगा, जिस प्रकार का संग करेगा, जिस प्रकार का चिंतन करेगा, वैसा ही उसका मन बनेगा । हमारी पौराणिक कथाएँ इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं कि जीव के संस्कारों का निर्माण माँ के गर्भ से ही प्रारंभ हो जाता है ।
अब इन्ही सब तथ्यों को आधुनिक विज्ञान भी पूरी तरह से प्रमाणित कर रहा है, फिर भी वर्तमान पीढ़ी इन तथ्यों से पूरी तरह आँख मूंदे हुए है । जो सोया हुआ हो,उसे तो जगाया जा सकता है पर जो सोने का नाटक कर रहा हो, उसे कौन जगा सकता है ? अपने को अत्याधुनिक प्रदर्शित करने के चक्कर में वह क्या खो रहे हैं ? जब तक इस तथ्य का साक्षात्कार उन्हें होगा तब तक बहुत देर हो चुकी होगी । फिर पछतावे के अलावा क्या बचेगा ?
Wednesday, 12 September 2012
कात्यायनी (ख़ुशी) के तृतीय जन्मदिन पर
आज
तुम्हारा जन्म दिन है
मेरी लाडली
और
मुझे
याद आ रहा है
वह घटनाक्रम
जो आज भी
स्मृतियों में
इस तरह जीवंत है
जैसे कल ही घटा हो
यह सब कुछ
आश्रम में
बैठे थे
हम
कि तभी तुम्हारे पापा का आया था
फ़ोन
उत्तेजना, निराशा और घबराहट
से परिपूर्ण स्वर में
तुम्हारे पापा ने बताया था
हमें
कि
कुछ दुश्वारियां आ जाने के कारण
तुम्हे गर्भ में ही ख़त्म करने की सलाह
दे रही है डॉक्टर
तुम्हारी दादी ने की थी
फ़ोन पर
डॉक्टर से बात
डॉक्टर ने
किया था निर्देशित
तुरंत निर्णय लेने के लिए
अनिर्णय की स्थिति में
कुछ भी घटित होने की चेतावनी देते हुए
यह भी कहा था
कि यदि आप लोग गर्भ रोकने का निर्णय लेते हैं
तो बच्चे के विकलांग पैदा होने की पूरी सम्भावना है
घबड़ा गए थे हम पूरी तरह से
स्वामी जी को जैसे ही पूरी बात बतायी
मुझे आज भी याद है
स्वामी जी का वह तमतमाया हुआ चेहरा
वह थरथराती हुई आवाज
"तुम और तुम्हारी डॉक्टर भगवान बन गए हो
तुम लोग निर्णय लोगे
कि
किस जीव को धरती पर आना है किसे नहीं ?"
हमने डरते हुए बताया
कि पैदा होने कि स्थिति में
बच्चे के विकलांग होने की पूरी सम्भावना है
वह पूरे विश्वास के साथ बोले
कि मैं गारंटी लेता हूँ
बच्चे को कुछ नही होगा
वह पूरी तरह स्वस्थ और मेधावी होगा
इतना कहकर
वह उठे थे तेजी से
आश्रम के बाहर
धार्मिक पुस्तकों की दूकान से
लेकर लौटे थे वे
"संतान गोपाल स्त्रोत"
इस पुस्तक के दसवें श्लोक पर
अपने हाथ से लगाकर निशान
पुस्तक
मुझे देते हुए
बोले
कि तुम्हे नित्य पाठ करना है
इसका
और दसवें श्लोक की माला
कम से कम एक बार अवश्य जपनी है
और ख़ाली समय में मौन होकर निरंतर जप करना है
श्लोक को जाग्रत करने की प्रक्रिया बताते हुए
उन्होंने आश्वस्त किया कि प्रभु कृपा करेंगे
और सब कुछ शुभ होगा
और इस तरह तुम माँ के गर्भ में ही
काल को पराजित करके
धरा पर अवतरित हुई थी
मेरी माँ, मेरी दुर्गा, मेरी कात्यायनी
मुझे
यह भी याद है कि जब हमने
स्वामी जी को तुम्हारे जन्म का समाचार दिया था
तो वह खुश होकर बोले थे
कि यह तुम सब के जीवन में खुशियाँ लेकर आई है
अत: इसका नाम ख़ुशी होगा
आज के दिन
मेरे गुरु, मेरे पिता मेरे भगवान
विष्णु लोक से यही आशीर्वाद दे रहे हैं
कि तुम अपने पवित्र आचरण से
अपने संपर्क में आने वाले हर प्राणी के जीवन को
खुशियों से भर देना
मेरी बच्ची
महर्षि कत्य के तप से प्रसन्न होकर
माँ ने महर्षि को
मनचाहा वरदान देते हुए कहा था
मैं आपकी इच्छा अनुसार
आपकी पुत्री के रूप में ही दुष्टों का संहार करने के लिए
धरा पर अवतरित होउंगी
और मेरा नाम आपके नाम पर ही कात्यायनी होगा
अपने नाम ख़ुशी और कात्यायनी को सार्थक करना
मेरी लाडली
आज के दिन मेरा भी यही आशीर्वाद है |
तुम्हारा जन्म दिन है
मेरी लाडली
और
मुझे
याद आ रहा है
वह घटनाक्रम
जो आज भी
स्मृतियों में
इस तरह जीवंत है
जैसे कल ही घटा हो
यह सब कुछ
आश्रम में
बैठे थे
हम
कि तभी तुम्हारे पापा का आया था
फ़ोन
उत्तेजना, निराशा और घबराहट
से परिपूर्ण स्वर में
तुम्हारे पापा ने बताया था
हमें
कि
कुछ दुश्वारियां आ जाने के कारण
तुम्हे गर्भ में ही ख़त्म करने की सलाह
दे रही है डॉक्टर
तुम्हारी दादी ने की थी
फ़ोन पर
डॉक्टर से बात
डॉक्टर ने
किया था निर्देशित
तुरंत निर्णय लेने के लिए
अनिर्णय की स्थिति में
कुछ भी घटित होने की चेतावनी देते हुए
यह भी कहा था
कि यदि आप लोग गर्भ रोकने का निर्णय लेते हैं
तो बच्चे के विकलांग पैदा होने की पूरी सम्भावना है
घबड़ा गए थे हम पूरी तरह से
स्वामी जी को जैसे ही पूरी बात बतायी
मुझे आज भी याद है
स्वामी जी का वह तमतमाया हुआ चेहरा
वह थरथराती हुई आवाज
"तुम और तुम्हारी डॉक्टर भगवान बन गए हो
तुम लोग निर्णय लोगे
कि
किस जीव को धरती पर आना है किसे नहीं ?"
हमने डरते हुए बताया
कि पैदा होने कि स्थिति में
बच्चे के विकलांग होने की पूरी सम्भावना है
वह पूरे विश्वास के साथ बोले
कि मैं गारंटी लेता हूँ
बच्चे को कुछ नही होगा
वह पूरी तरह स्वस्थ और मेधावी होगा
इतना कहकर
वह उठे थे तेजी से
आश्रम के बाहर
धार्मिक पुस्तकों की दूकान से
लेकर लौटे थे वे
"संतान गोपाल स्त्रोत"
इस पुस्तक के दसवें श्लोक पर
अपने हाथ से लगाकर निशान
पुस्तक
मुझे देते हुए
बोले
कि तुम्हे नित्य पाठ करना है
इसका
और दसवें श्लोक की माला
कम से कम एक बार अवश्य जपनी है
और ख़ाली समय में मौन होकर निरंतर जप करना है
श्लोक को जाग्रत करने की प्रक्रिया बताते हुए
उन्होंने आश्वस्त किया कि प्रभु कृपा करेंगे
और सब कुछ शुभ होगा
और इस तरह तुम माँ के गर्भ में ही
काल को पराजित करके
धरा पर अवतरित हुई थी
मेरी माँ, मेरी दुर्गा, मेरी कात्यायनी
मुझे
यह भी याद है कि जब हमने
स्वामी जी को तुम्हारे जन्म का समाचार दिया था
तो वह खुश होकर बोले थे
कि यह तुम सब के जीवन में खुशियाँ लेकर आई है
अत: इसका नाम ख़ुशी होगा
आज के दिन
मेरे गुरु, मेरे पिता मेरे भगवान
विष्णु लोक से यही आशीर्वाद दे रहे हैं
कि तुम अपने पवित्र आचरण से
अपने संपर्क में आने वाले हर प्राणी के जीवन को
खुशियों से भर देना
मेरी बच्ची
महर्षि कत्य के तप से प्रसन्न होकर
माँ ने महर्षि को
मनचाहा वरदान देते हुए कहा था
मैं आपकी इच्छा अनुसार
आपकी पुत्री के रूप में ही दुष्टों का संहार करने के लिए
धरा पर अवतरित होउंगी
और मेरा नाम आपके नाम पर ही कात्यायनी होगा
अपने नाम ख़ुशी और कात्यायनी को सार्थक करना
मेरी लाडली
आज के दिन मेरा भी यही आशीर्वाद है |
Thursday, 21 June 2012
सो माया बस भयो गोसाईं, बंध्यो कीर मरकट की नाईं
जब भी किसी उम्रदराज व्यक्ति से मुलाकात होती है तो हर बुजुर्ग आदमी की यही शिकायत होती है कि वह अब सब कुछ छोड़कर भगवान का भजन करना चाहता है, पर वह करे तो क्या करे ? यह संसार उसे छोड़ता ही नहीं है । जब वह यह कहता है तो मुझे मानस की यही पंक्ति,"सो माया बस भयो गोसाईं, बंध्यों कीर मरकट की नाईं ।" याद आ जाती है । हम सभी मानवों की यही हालत है ।
जब जीव इस धरती पर आता है तो वह आकाश से गिरने वाली पानी की बूंद की तरह पवित्र,निर्मल और स्वच्छ होता है पर जैसे ही यह पवित्र बूंद धरती का स्पर्श करती है, मटमैली हो जाती है । उसी प्रकार यह जीव भी जैसे ही धरती का स्पर्श करता है, माया आकर उससे लिपट जाती है,"भूमि परत भा ढाबर पानी,जिम जीवहिं माया लिपटानी" और फिर यह माया जीव से पूरे जीवन भर किसी न किसी रूप में लिपटी ही रहती है । कभी माँ-बाप के रूप में, कभी प्रेमी -प्रेमिका के रूप में, कभी पत्नी और बच्चों के रूप में, कभी सुन्दरता के रूप में,कभी ज्ञान और पद के अहंकार के रूप में,कभी दानी और त्यागी के रूप में,कभी साधू और सन्यासी होने के अहंकार के रूप, यानि यह माया किसी न किसी रूप में जीव से लिपटी ही रहती है ।
जीव नित्य मुक्त है । पर माया के आवरण के कारण वह अपने को कीर और मरकट की तरह यह मानता है कि संसार उसे पकडे हुए है । जब कि वास्तिविकता यही है कि संसार उसे नहीं पकड़े,वही संसार को पकड़े हुए है । शिकारी तोते{कीर}को पकड़ने के लिए एक रस्सी के ऊपर पोपली [पोला बांस] चढ़ा देता है और नीचे तोते का प्रिय खाद्य मिर्च डाल देता है । तोता जैसे ही मिर्च के खाने के लालच में पोपली के ऊपर बैठता है, पोपली पलट जाती है और तोता सिर के बल नीचे लटक जाता है । तोता यह समझता है कि पोपली ने उसे पकड़ लिया है, जब कि वास्तविकता यह है कि वह पोपली को पकड़े हुए है । वह पोपली को छोड़ दे तो वह नित्य मुक्त है पर वह माया के आवरण के कारण पोपली को छोड़ नहीं पाता और यह काल रूपी शिकारी उसे पकड़ कर अपने साथ ले जाता है ।
ठीक यही स्थिति मरकट [बंदर] की होती है । शिकारी उसको पकड़ने के लिए, एक सकरे मुंह का घड़ा[सुराही], जमीन में गाड़ देता है और उस घड़े में बंदर का प्रिय खाद्य [चने] डाल देता है ।बंदर चने के लालच में घड़े में हाथ डालकर, चने अपनी मुट्टी में भर लेता है । अब मुट्टी सुराही का मुहं सकरा होने के कारण, निकल नहीं पाती तो वह समझता है कि घड़े ने उसे पकड़ लिया है और तभी काल रूपी शिकारी आकर उसे पकड़ लेता है । यदि बंदर चनों का लालच छोड़ कर मुट्टी खोल दे तो वह जीव की तरह नित्य मुक्त तो है ही ।
इसी माया के आवरण के कारण जीव समझता है कि संसार उसे पकडे हुए है, जबकि वास्तविकता यही है कि जीव संसार को पकडे हुए है । जीव पुरुषार्थ के द्वारा इस माया के पार नहीं जा सकता । इसके लिये उसे प्रभु की शरणागति स्वीकार करनी पड़ेगी, तभी वह इस माया के आवरण को भेदने में समर्थ हो सकेगा । भगवान गीता में स्पष्ट घोषणा कर रहे हैं,"मामेव ये प्रपद्यन्ते, मायामेतां तरन्ति ते" पर हम भगवान को तो मानते है पर भगवान की कही बात पर विश्वास नहीं करते । यही हमारे दुःख का कारण है । इसके लिए हम ही दोषी हैं, कोई दूसरा नहीं ।
शेष प्रभु कृपा ।
जब जीव इस धरती पर आता है तो वह आकाश से गिरने वाली पानी की बूंद की तरह पवित्र,निर्मल और स्वच्छ होता है पर जैसे ही यह पवित्र बूंद धरती का स्पर्श करती है, मटमैली हो जाती है । उसी प्रकार यह जीव भी जैसे ही धरती का स्पर्श करता है, माया आकर उससे लिपट जाती है,"भूमि परत भा ढाबर पानी,जिम जीवहिं माया लिपटानी" और फिर यह माया जीव से पूरे जीवन भर किसी न किसी रूप में लिपटी ही रहती है । कभी माँ-बाप के रूप में, कभी प्रेमी -प्रेमिका के रूप में, कभी पत्नी और बच्चों के रूप में, कभी सुन्दरता के रूप में,कभी ज्ञान और पद के अहंकार के रूप में,कभी दानी और त्यागी के रूप में,कभी साधू और सन्यासी होने के अहंकार के रूप, यानि यह माया किसी न किसी रूप में जीव से लिपटी ही रहती है ।
जीव नित्य मुक्त है । पर माया के आवरण के कारण वह अपने को कीर और मरकट की तरह यह मानता है कि संसार उसे पकडे हुए है । जब कि वास्तिविकता यही है कि संसार उसे नहीं पकड़े,वही संसार को पकड़े हुए है । शिकारी तोते{कीर}को पकड़ने के लिए एक रस्सी के ऊपर पोपली [पोला बांस] चढ़ा देता है और नीचे तोते का प्रिय खाद्य मिर्च डाल देता है । तोता जैसे ही मिर्च के खाने के लालच में पोपली के ऊपर बैठता है, पोपली पलट जाती है और तोता सिर के बल नीचे लटक जाता है । तोता यह समझता है कि पोपली ने उसे पकड़ लिया है, जब कि वास्तविकता यह है कि वह पोपली को पकड़े हुए है । वह पोपली को छोड़ दे तो वह नित्य मुक्त है पर वह माया के आवरण के कारण पोपली को छोड़ नहीं पाता और यह काल रूपी शिकारी उसे पकड़ कर अपने साथ ले जाता है ।
ठीक यही स्थिति मरकट [बंदर] की होती है । शिकारी उसको पकड़ने के लिए, एक सकरे मुंह का घड़ा[सुराही], जमीन में गाड़ देता है और उस घड़े में बंदर का प्रिय खाद्य [चने] डाल देता है ।बंदर चने के लालच में घड़े में हाथ डालकर, चने अपनी मुट्टी में भर लेता है । अब मुट्टी सुराही का मुहं सकरा होने के कारण, निकल नहीं पाती तो वह समझता है कि घड़े ने उसे पकड़ लिया है और तभी काल रूपी शिकारी आकर उसे पकड़ लेता है । यदि बंदर चनों का लालच छोड़ कर मुट्टी खोल दे तो वह जीव की तरह नित्य मुक्त तो है ही ।
इसी माया के आवरण के कारण जीव समझता है कि संसार उसे पकडे हुए है, जबकि वास्तविकता यही है कि जीव संसार को पकडे हुए है । जीव पुरुषार्थ के द्वारा इस माया के पार नहीं जा सकता । इसके लिये उसे प्रभु की शरणागति स्वीकार करनी पड़ेगी, तभी वह इस माया के आवरण को भेदने में समर्थ हो सकेगा । भगवान गीता में स्पष्ट घोषणा कर रहे हैं,"मामेव ये प्रपद्यन्ते, मायामेतां तरन्ति ते" पर हम भगवान को तो मानते है पर भगवान की कही बात पर विश्वास नहीं करते । यही हमारे दुःख का कारण है । इसके लिए हम ही दोषी हैं, कोई दूसरा नहीं ।
शेष प्रभु कृपा ।
Monday, 18 June 2012
ईश्वर अंश जीव अविनाशी
"
ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन,अमल,सहज सुख राशी |" यह जीव ब्रह्म की ही तरह
अविनाशी है | इसका कभी भी नाश नहीं होता | नाश शरीर का होता है आत्मा का
नहीं | "वासांसि जीरणानि यथा विहाय,नवानि गृह्णाति नारोपराणि | तथा
शरीराणि विहाय जीर्ण|न्यन्यानि संयाति नवानि देहि |" जिस प्रकार नर,
वस्त्र पुराने हो जाने पर, नए वस्त्र ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार जीव,
शरीर पुराना हो जाने पर, नया शरीर ग्रहण कर लेता है | इसी तरह जैसे ब्रह्म
शाश्वत है,उसी तरह जीव भी शाश्वत है | जन्म शरीर का होता है,नाश शरीर का
होता है,जीव का नहीं,"न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न
भूय: | अजो नित्य: शाश्वतोयम पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे |" इसलिए जिस
तरह ब्रह्म का कभी भी नाश नहीं होता, उसी प्रकार जीव का भी कभी नाश नहीं
होता |
जिस प्रकार से ईश्वर या ब्रह्म चेतन है उसी प्रकार जीव भी चेतन है | जीव के चेतन होने का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि शरीर से जीव के निकल जाने के बाद, शरीर जड़ हो जाता है | इसका अर्थ यही हुआ कि शरीर में जो चेतनता थी, उसका कारण जीव था | जिस तरह से सारी प्रकृति जड़ है | इस जड़ प्रकृति को चेतनता प्रदान करती है,ब्रह्म की उपस्थिति | ब्रह्म के प्रकाश से ही, प्रकृति प्रतिभासित होती है,उसी प्रकार जीव की उपस्थिति ही जड़ शरीर को प्रतिभासित करती है |
जिस प्रकार ब्रह्म अमल है | यानि मल रहित या विकार रहित है | उसी प्रकार
जीव भी अमल है,यानि मल या विकार रहित है | जीव जब ब्रह्म से उसके अंश के
रूप में धरती पर आता है तो वह अपने मूल की ही तरह अमल एवं विकार रहित होता
है | जिस तरह पानी की बूंद जब बादल से अलग होती है तो वह एकदम शुद्ध होती
है पर धरती का स्पर्श होते ही वह मटमैली हो जाती है उसी प्रकार जीव के भी
धरती पर आते ही, माया उससे लिपट जाती है | " भूमि परत भा ढाबर पानी. जिम
जीवहि माया लिपटानी |"
जिस प्रकार ब्रह्म सहज है उसी प्रकार जीव भी सहज है | जीव में असहजता आती
है माया के कारण | माया का विस्तार इतना व्यापक है कि उससे पार पाना जीव के
लिए पुरुषार्थ के द्वारा संभव नहीं है, इसके लिए जीव को प्रभु के शरण में
जाना ही पड़ेगा, "मामेव ये प्रपद्यन्ते, मायामेतां तरन्ति ते"
जिस प्रकार ब्रह्म सुख की राशि है, उसी प्रकार जीव भी सुख की राशि है |
ब्रह्म को वेदों ने "रसो वै स:" यानि ईश्वर या ब्रह्म, रस यानि आनंद का ही
स्वरुप है | ईश्वर को सुख का सागर कहा गया है और इसी सुख के सागर से ही
हमारी उत्पत्ति हुई है | जिस वस्तु की उत्पत्ति जहाँ से होती है, उसे अपने
उद्गम स्थल से मिलकर अपार सुख का अनुभव होता है | दीपक की लव में प्रकाश
सूरज का ही अंश है, इसलिए दीपक की लव उर्ध्वमुखी होती है,अपने उद्गमस्थल
सूर्य से मिलने के लिए आतुर, क्योंकि उससे मिलकर अपने अस्तित्व का तिरोहण
करने में ही उसे सुख की अनुभूति होती है | इसी प्रकार जल की उत्पत्ति सागर
से होती है अत: जल के हर बूंद की यही कामना होती है कि वह सागर में मिलकर
अपने अस्तित्व की समाप्ति कर दे क्योंकि इसी में उसे सुख की अनुभूति होती
है |
यह विषय इतना व्यापक है कि वेदों ने भी नेति-नेति कहकर अपनी असमर्थता
व्यक्त कर दी है, अत: मैं अपने जीवन के अनुभव के आधार पर कुछ बातें आपसे
कहकर अपनी बात समाप्त करता हूँ | जैसा कि उपरोक्त से यह स्पष्ट हो गया है
कि हम उस ईश्वर के अंश के रूप में इस धरती पर आये हैं जो चेतन है,अमल
है,सहज है और सुख की राशि है | पर धरती पर आते ही माया के वशीभूत होकर हम
संसार में सुख की तलाश कर रहे हैं | हर जीव संसार में जो भी कर रहा है वह
कर सुख के लिए ही रहा है | आप मकान बनवाते हो यह मानकर की यह आपको सुख देगा
| आप धन इकट्टा करते हो यह सोचकर कि यह आपको सुख देगा | आप शादी करते हो
यह मानकर कि पत्नी आपको सुख देगी | आप बच्चे पैदा करते हो यह मानकर कि यह
आपको सुख देंगे | आप दान करते हो यह सोचकर कि इससे आपको यश मिलेगा, समाज
आपको सम्मान देगा और उसमे आपको सुख मिलेगा | आप शराब भी पीते हो तो इसीलिए
कि उसमे आपको सुख मिलता है | यह सब हम जो भी संसार में करते है वह सुख के
लिए ही करते है क्योंकि सुखसागर से हमारी उत्पत्ति हुई है | हम भी सुख
स्वरुप है | पर मेरे मित्रो यह सारा का सारा सांसारिक सुख ह्रास्य्मान है |
इसके प्राप्त होते ही इसका क्षरण शुरू हो जाता है | एक उपनिषद् कहता है कि
सारे संसार का राज्य,सारे संसार का वैभव, सारे संसार का सौंदर्य,सारे
संसार का ज्ञान भी अगर प्राप्त हो जाये तो" तत: किम" | इस" तत: किम " में
ही आपके समस्त प्रश्नों के उत्तर निहित है | आप के अंदर जिस दिन यह
जिज्ञासा जग जाएगी कि "को अहम" उस दिन आप अपने उद्गमस्थल,सुखसागर की तलाश
में निकल पड़ोगे और इसमें मिलने वाला सुख निरंतर वर्धमान होगा | इस यात्रा
का समापन मूल उद्गमस्थल जो सुख का सागर है में अपने अस्तित्व के पूर्ण
समर्पण से होगा और तब जीव कह उठेगा "सो अहम" |
आइये हम सब इस यात्रा का शुभारम्भ करें, भले ही हम इस जन्म में वहां तक न
पहुँच पाए,पर कुछ कदम तो उस दिशा में चल ही लेंगे | अगले जन्म में यह कुछ
कदम मंजिल की दूरी को कम करने में तो सहायक होंगे ही, क्योंकि भगवान गीता
में स्पष्ट रूप से घोषणा कर रहे है,"नेहाभिक्रमनासोअस्ति प्रत्यवायो न
विद्यते,स्वल्म अप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात" या "शुचीनाम श्रीमताम
गेहे योग भ्रष्टो अभिजायते"
शेष प्रभु कृपा |
जिस प्रकार से ईश्वर या ब्रह्म चेतन है उसी प्रकार जीव भी चेतन है | जीव के चेतन होने का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि शरीर से जीव के निकल जाने के बाद, शरीर जड़ हो जाता है | इसका अर्थ यही हुआ कि शरीर में जो चेतनता थी, उसका कारण जीव था | जिस तरह से सारी प्रकृति जड़ है | इस जड़ प्रकृति को चेतनता प्रदान करती है,ब्रह्म की उपस्थिति | ब्रह्म के प्रकाश से ही, प्रकृति प्रतिभासित होती है,उसी प्रकार जीव की उपस्थिति ही जड़ शरीर को प्रतिभासित करती है |
Subscribe to:
Posts (Atom)