Monday, 30 April 2012
Friday, 27 April 2012
जीवन में व्यवहारिक नियमों का पालन अति आवश्यक है |
"सीय-राम मय सब जग जानी, करहुं प्रणाम जोरि जुग पानी" या "सब देखहिं प्रभुमय जगत केहि सन करहिं विरोध" जब तक जीव इस भाव भूमि पर स्थापित न हो जाये तब तक उसे जीवन में व्यवहारिक नियमों का पालन अवश्य करना चाहिये, नहीं तो उसका जीवन नरक हो जायेगा । कार्यालय में यदि आप सहकर्मियों में अपने प्रभु का दर्शन करने लगे तो स्वाभाविक है कि आप न तो उनसे कड़े शब्दों का प्रयोग ही कर पाएंगे और न ही उनकी लापरवाही के प्रति कोई दंड ही दे पाएंगे । प्रभु को भी लीला के लिए ही सही यह कहना पड़ा,"विनय न मानत जलधि जड़, गये तीन दिन बीत । बोले राम सकोप तब, भय बिन होय न प्रीति ।"अम्मा कहा करती थी कि प्रेम मन की गहराइयों में छिपा कर रखना चाहिए ऐसा मेरे पिताजी कहा करते थे । अनुशासन बनाये रखने के लिये, हर रिश्ते में एक फासला होना जरुरी है । अपने वक्त के एक महान संत ने यह कहा था कि शिष्य को अपने गुरु के बहुत नजदीक नहीं जाना चाहिए, हमेशा दोनों के बीच में एक फासला आवश्यक है । गुरु यदि शिष्य को मुहँ लगा लेता है तो किसी न किसी दिन शिष्य के द्वारा, अनचाहे ही गुरु का अपमान हो जायेगा । यह बात सभी रिश्तों में लागू होती है । चाहे वह पति-पत्नी का रिश्ता हो चाहे पिता-पुत्र का, पिता- पुत्री का, चाहे सास-बहू,श्वसुर-बहू का , चाहे मालिक-नौकर या राजा और प्रजा का हो, हर रिश्ते की गरिमा बनाये रखने के लिये उनके बीच एक फासला होना बहुत जरुरी है । सुनने में यह बात बहुत अच्छी लगती है कि बहू को अपनी बेटी की तरह ही समझना चाहिए । आप लाख उसे बेटी समझ लें पर वह शायद ही आपको अपने माता-पिता की तरह अन्तरंग समझ सके । एक प्रबुद्ध महिला ने एक बार कहा था कि यह कोशिश आप करते ही क्यों है ? दोनों रिश्ते अपनी-अपनी जगह महत्वपूर्ण है । दोनों को अलग-अलग ही रहने दें । यही बात पुत्र और दामाद के रिश्ते में भी लागू होती है । दामाद को पुत्र की तरह प्यार तो दो पर उससे पुत्र की तरह अपेक्षा मत करो ।
शेष प्रभु कृपा
शेष प्रभु कृपा
Wednesday, 22 February 2012
Sunday, 5 February 2012
विवाह की ३६ वीं वर्ष गांठ पर
आज से ३६ वर्ष पूर्व
अंनंत आकाश में
कुलांचे भरने वाला
यह मुक्त प्राणी
जकड़ दिया गया था
बन्धनों में ।
और यह बंधन का स्वीकार
उसका स्वयं वरित था
क्योंकि
थक जाने पर
इस मुक्त प्राणी ने
जब भी किसी आधार का सहारा लेकर
विश्रांति पानी चाही
तब-तब आधारों ने सहारा देने की बजाय
दिया था उसे
मानसिक यंत्रणा, त्रास और विश्वासघात का दंश
तब मुझे लगा
कि मैं नहीं सम्हाल पाउंगा
अपना मानसिक संतुलन
मेरी माँ
हाँ मेरी प्यारी-प्यारी वह माँ
जिसने युवा अवस्था से ही झेली थी
वैधव्य की पीड़ा
जिसकी जाने कितनी आशाएं,आकांक्षाएं टिकी थी
मेरे ऊपर
माँ जो मेरा विवाह संपन्न कराकर
मुक्त होना चाहिती थी
अपने सामाजिक,पारिवारिक,भौतिक
अंतिम उत्तरदायित्व से
माँ
जिसका चेहरा उदास रहने लगा था
मेरे लगातार विवाह से इंकार करने पर
और तभी
विक्षिप्तता की ओर तेजी से बढ़ रहा
मैं
कांप उठा यह सोंचकर
कि यदि मैं ठीक नहीं रख पाया अपना मानसिक संतुलन
तो जीवन भर अपने बच्चों के लिए संघर्ष करती रही
मेरी माँ
कैसे रह पायेगी मेरे बिना ?
और तब मैंने सिर झुका कर मान लिया
अपनी माँ का आदेश
और इस तरह तुम मेरे जीवन में
आयी थीं
मेरे तीन बच्चों की माँ
मेरी दुर्गा, मेरी सुशी
५-२-१९७६ का अंक ३ था
५-२-२०१२ का अंक भी ३ है
और आज ३६ वर्ष का अंक ९ है
जो कि बहुत ही शुभ अंक माना जाता है
क्योंकि यह पूर्णांक का द्योतक है
३६ वर्षों तक
मुझ जैसे व्यक्ति को
झेलने का अप्रतिम साहस
जिसने दिया है तुमको
उसके लिये आभारी हूँ
मैं
अपने प्रभु का, अपने गुरु का, अपनी माँ का,अपनी मम्मी का
और तुम्हारा भी
हाँ तुम्हारा भी
क्योंकि
तुमने दिये हैं
मुझे
प्यारे-प्यारे ३ संस्कारित बच्चे
जिन्होंने दिये हैं
मुझे
माँ काली, माँ लक्ष्मी और माँ सरस्वती की अवतार
कात्यायनी,श्राव्या और मनस्विनी जैसी
प्यारी-प्यारी राजकुमारियां
जिनका कोमल स्पर्श
जिनकी निश्छल हंसी
भर देती है न ख़त्म होने वाली ऊर्जा से
मुझे अंदर तक
और एक स्निग्ध तरलता में
आकंठ डूब जाता हूँ
मैं
इसके लिये मैं आभारी हूँ
तुम्हारा
मेरी प्यारी-प्यारी सुशी
Saturday, 4 February 2012
मनस्विनी की प्रथम वर्षगांठ पर
मैं
ख्वाबों में, खोई अपनी बिटिया को
"उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधयत "
का मंत्र सुनाने आया हूँ ।
मैं
उसको
उसके पुरखों की
या स्वर्णिम परम्परा के वाहक होने की
याद दिलाने आया हूँ ।
तुम आयी थी
आज धरा पर
जो मेरी संस्कृति का उल्लास पर्व है ।
यह स्रष्टि के पांचो तत्वों का
राग पर्व - अनुराग पर्व है ।
आकाश की नीलाभ निर्भ्रता
शीतल मंद सुगन्धित मलयानिल की स्पर्शयता
आम्र मंजरियों की शीतल दाहकता
नदियों के लहरों की स्निग्ध कोमलता
और और और
सरसों की पीली साड़ी पहिने
गुलाबों की महावर लगाये
बाहें फैलाये
धरा की सुन्दरता
व्याकुल है
स्वागत करने को
बसंत का
बसंतपंचमी
जो साक्षी है
माँ सरस्वती के अवतरण का
बसंतपंचमी जो साक्षी है
क्रान्तिदर्शी महाप्राण निराला के आगमन का
यही तुम्हारी परम्परा है
मेरी बच्ची
माँ सरस्वती की तरह
मन और बुद्धि पर
शासन हो तुम्हारा
मेरी बच्ची
माँ सरस्वती की ही तरह
शुभ्र वसना होना
मेरी लाड़ली
और उन्ही की वीणा की झंकार की तरह
तुम्हारी वाणी
मुरझाये उदास चेहरों में
निराश टूटे दिलों में
जीवन का उल्लास भर दे
मेरी दुलारी
नीर-क्षीर विवेकी बुद्धि रूपी हंस ही
तुम्हारा वाहन बने ।
महाप्राण निराला की तरह
दीन-दुखी लोगो को देखकर
तुम्हारी आखों में जल हो
और चेहरे पर व्यवस्था को बदलने का
संकल्प
यही आज के दीन मेरा आशीर्वाद है
मेरी बच्ची,मेरी लाड़ली,
अपने माँ-बाप की
अपनी परम्पराओं की
वाहक बनना
मेरी राजकुमारी ।
Thursday, 26 January 2012
गणतंत्र दिवस पर
२६ जनवरी,१९५० को मेरे देश को संवैधानिक आज़ादी प्राप्त हुई थी । बहुत सारे राष्ट्रों के संविधान का सम्यक मनन एवं चिंतन करने के पश्चात् हमारे राष्ट्र के चिंतक, मनीषियों, विधि वेत्ताओं एवं राज नेताओं ने मिलकर हमको एक सशक्त संविधान दिया था । उनके इस देय के लिये,आज के दिन मैं उन्हें कोटि-कोटि नमन करता हूँ । यह संविधान ही है जो हमारे मौलिक अधिकारों को तमाम झंझावातों के बाद भी सुरक्षित रक्खे हुए है । कितनी बार प्रयास नहीं किया गया हमारे मदांध शासकों द्वारा हमारे इन मौलिक अधिकारों को छीनने का ? अपनी सत्ता बचाने के लिये,इस राष्ट्र ने आपातकाल का एक ऐसा काल भी देखा है जो इतिहास के पन्नों में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है । उस काल में दंशित हुए व्यक्ति आज भी उसे याद कर सिहर उठते हैं । यह इस देश के गणतंत्र का ही कमाल है कि उन मदांध शासकों को, इसका खामियाजा, सत्ता से च्युत होकर चुकाना पड़ा । उस समय भी इस गण की एक इकाई पूरी दबंगई के साथ मदांध शासको को खुली चुनौती दे रही थी,
" कौन कहता है कि आकाश में सूराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों "
" कहाँ तो तय था चिरागां हर एक घर के लिये, कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिये
न हो कमीज तो पावों से पेट ढक लेगें, यह लोग कितने मुनासिब है इस सफ़र के लिये "
जब-जब भी व्यक्ति के संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों को छीनने का प्रयास किया गया है, यह गणतंत्र की ही ताकत थी कि उसने इनकी रक्षा की है । आज इतिहास से सबक न लेते हुए, फिर से इस तरह के प्रयास किये जा रहे है पर मैं आश्वस्त हूँ कि मेरे देश का गणतंत्र इतना मजबूत हो चुका है कि यह अब किसी के लिये भी संभव नहीं होगा कि वह इस देश की अस्मिता के साथ खिलवाड़ कर सके ।
शेष प्रभु कृपा ।
Tuesday, 17 January 2012
अन्तर्भेदी द्रष्टि
मैं अपने गुरु जी की अनिच्छा के बावजूद पहिली बार बाहर गया था | लगभग २ वर्षों से गुरु जी अस्वस्थ चल रहे थे और पिछले डेढ़ वर्षों से उन्होंने मुझे कहीं भी बाहर जाने की अनुमति नहीं दी थी | इस अन्तराल में ही मेरी दो भाभियों का शरीर शांत हुआ और एक भतीजी का विवाह भी हुआ, किन्तु अनुमति न मिल पाने के कारण मैं नहीं जा सका | इससे मेरे परिजन नाराज भी हुये | ४ दिसम्बर को मेरी छोटी बेटी के देवर का विवाह आगरा में था | वह महाराज जी का भी कृपापात्र था, जब हम दोनों लोगो ने जाने की अनुमति मांगी तो उन्होंने मना कर दिया | जब मैंने कयी बार अनुरोध किया और यह कहा कि दोनों में से एक व्यक्ति भी न जायेगा तो अच्छा नहीं लगेगा तो उन्होंने बड़े बेमन से केवल मुझे जाने की अनुमति दी | मैंने जब ६ दिसम्बर को वापिस आकर उन्हें प्रणाम किया तो उन्होंने बैठाने का इशारा किया | उन्हें बिठाकर मैं उनके सामने ज़मीन में बैठ गया | मेरी धर्मपत्नी उन्हें सहारा दिये उनके बगल में बैठी थी | मेरे गुरु अपनी अन्तर्भेदी द्रष्टि से मुझे लगातार देख रहे थे और मैं द्रष्टि की अन्तर्भेदी करुणा से इतना विगलित हो गया था कि उनकी तरफ न देखकर जानबूझकर दूसरी तरफ देख रहा था | मेरा मन कर रहा था मैं उनसे लिपटकर जी भरकर रो लूँ | मेरी पत्नी ने स्वामी जी से हास्य में कहा कि आप इन्ही को ज्यादा चाहते हैं, जो आपको छोड़कर आगरा चले गये थे और आप इन्ही को देखे जा रहे है | पत्नी ने मुझसे कहा कि जरा इधर देखो न | यह कैसे तुम्हारा मुँह निहारे पड़े है और तुम इधर देख भी नहीं रहे हो | मैं सब देख रहा था, सब सुन रहा था, पर जानबूझ कर अनदेखा, अनसुना कर रहा था क्योंकि वह अन्तर्भेदी द्रष्टि मुझे अंदर तक चीरे डाल रही थी और उसका सामना करने का साहस मुझमें नहीं था |
विगत कुछ दिनों से मैं ऐसा महसूस कर रहा था कि गुरु जी मेरे चेहरे को निहारते रहते हैं | इससे मुझे डर लगने लगा था कि कहीं यह उनके महाप्रयाण की पूर्व सूचना तो नहीं है | यही भाव मुझे अंदर तक कंपा जाता था | वही हुआ जिसका डर मुझे लगातार भयाक्रांत किये हुए था | ८ दिसम्बर को उन्होंने मुझे और मेरी पत्नी को सामाजिक संबंधों के निर्वहन के लिए मुक्त करते हुए, महाप्रयाण कर दिया | मैं और मेरी पत्नी दोनों महाप्रयाण के समय उनके पास नहीं थे |
हम जब स्टेशन से अमित को लेकर निकल ही रहे थे कि आश्रम से सूचना आई कि हम तुरंत आश्रम पहुंचे | हमें होनी का आभास हो गया था और हम जब आश्रम पहुंचे तो उन्हें आसन में बिठाया जा चुका था | उनकी आँखे खुली हुई थी | वह उपर की ओर देख रहे थे | मुझे ऐसा लगा कि मानो वह मुझे जाते-जाते सन्देश छोड़ गये हैं कि अब तो मैं संसार को देखना छोड़ दूँ और उपर की तरफ देखना शुरूं कर दूँ जहाँ मुझे जाना है | यह संसार के प्रति मेरा मोह ही था जिसने अंतिम समय में मुझे उनसे अलग कर दिया था |
मेरे गुरु अंतिम समय तक मुझे मोह से उबारने का प्रयास करते रहे पर अभागा मैं आज तक इस मोह को अपने से अलग नहीं कर सका | बीच-बीच में विरक्ति का भाव प्रबल होता है पर तभी मोह अपने रूप बदल कर फिर से अपने बंधन में जकड़ लेता है | कभी नातिनो के रूप में, कभी पोती के रूप में | मेरे गुरु की अन्तर्भेदी द्रष्टि आज भी मुझे भेदती रहती है | कभी-कभी गहन निद्रा में वही द्रष्टि मुझे झिझोंढकर जगा देती है, जैसे मुझसे पूंछ रही हो, कब ख़त्म होगी मेरी प्रतीक्षा ? मेरे गुरु,मेरे प्रभु, मेरे पिता, मेरे भगवान मैं आभारी हूँ आपका और आपकी अन्तर्भेदी द्रष्टि का जो आज भी इस नारकीय जीव को अपनी करुणा का दान देकर,निकालने के लिये व्याकुल है, इस नरक से | प्रभु मेरे बस का कुछ नहीं है | मेरे बस का होता तो जाने कब का तोड़ चुका होता इस मोह के बंधन को | तुम्हारी कृपा ही का सहारा है, मेरे प्रभु | मेरे उपर अपनी अहैतुकी कृपा की वर्षा कर दो मेरे स्वामी, मेरे प्रभु | यहाँ तक लाकर मुझे मझधार में न छोड़ो, मेरे भगवान | तुम अकारण करुणावरुनालय हो मेरे उपर भी कृपा करके पार उतार दो, दीनदयाल |
शेष प्रभु कृपा |
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