Saturday, 13 June 2015
दशानन का अर्थ
रावन का शाब्दिक अर्थ होता है,जो दूसरे को रुलाए । दशानन का एक प्रतीकात्मक अर्थ और भी है ।वह यह कि जिसकी दशों इन्द्रियॉं (पॉंच कर्मेन्द्रियॉं और पॉंच ज्ञानेन्द्रियॉं) बहिरमुखी होती हैं,यानि जिसका इन इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं होता,उसे दशानन कहते हैं । और जो दशों इन्द्रियों का रथी होता है,यानि कि जिसका दशों इन्द्रियों पर नियंत्रण होता है, उसे दशरथ कहते हैं । जिस दिन व्यक्ति अपनी दशों इन्द्रियों पर नियंत्रण कर लेता है यानि दशरथ बन जाता है,उसी दिन प्रभु राम उसके ह्रदयागंन में खेलने लगते हैं ।
Friday, 12 June 2015
दूसरे को दर्पण न दिखाकर स्वंय दर्पण देखना चाहिए ।
स्वयं दर्पण देखने का अर्थ है कि आप अपना आत्मावलोकन करे और यदि कोई विषमता नज़र आए तो उस विषमता को जीवन से दूर करें । दूसरे को दर्पण दिखाने का अर्थ है कि सामने वाले को उसकी कमज़ोरियॉं बतायी जाएँ ।हर व्यक्ति को प्रतिदिन दर्पण देखना चाहिए,पर दूसरे को दर्पण दिखाने से बचना चाहिए । पर हम करते ठीक इसका उलटा है । यहीं तक नहीं,अपनी ग़लतियों से होने वाले नुक़सान के लिए भी, अपनी ज़िम्मेदारी स्वीकार न करके या तो समय और परिस्थितियों के उपर ज़िम्मेदारी डाल देते हैं या अन्य के ऊपर । जीवन में जो भी अच्छा होता है,उसके कर्ता स्वंय बनकर, श्रेय ले लेते हैं और जो भी ग़लत होता है,उसका कर्ता दूसरे को बनाकर दोष उसके ऊपर डाल देते हैं, यहाँ तक कि भगवान को भी दोषी सिध्द् करने से नहीं चूकते ।
घरों में प्रायः पति-पत्नी के बीच इस तरह के संवाद सुनने को मिलते हैं । यदि बच्चा अच्छा काम करके आया तो पिता कहेगा "आख़िर बच्चा है किसका ?" वही बच्चा जब ग़लत काम करके आता है तो पिता कहेगा,"बच्चे में सारे संस्कार तुम्हारे ही पड़ गए है,यदि एक-आध मेरे भी पड़ जाते तो इसका कल्याण हो जाता ।" यह संवाद मॉं की तरफ़ से भी बोले जा सकते हैं ।
आपके दो बच्चे हैं । एक भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयनित हो गया और दूसरा आवारा निकल गया । आप समाज के बीच में बैठे हैं,किसी व्यक्ति ने आपके प्रशासनिक सेवा में चयनित होने वाले बच्चे के लिए आपको बधाई दी और आपको भाग्यशाली ठहराया तो आपकी प्रतिक्रियात्मक टिप्पणी कुछ इस प्रकार होगी,"अरे,भाई साहब ! आप क्या जाने कि इसको यहाँ तक पहुँचाने में मुझे कितना श्रम करना पड़ा है ? कहॉं-कहॉं से जुगाड़ लगाकर इसको अच्छी कोचिंग करा पाया हूँ ,तब जाकर कहीं इसको यह सफलता मिली है । वहीं बैठे किसी दूसरे व्यक्ति ने यदि दबे स्वर में आपके आवारा बच्चे का ज़िक्र कर दिया,तो आपकी टिप्पणी कुछ इस प्रकार होगी,"अरे भाई मैंने तो यही प्रयास किया था कि मेरे दोनों बच्चे अच्छे निकले पर भगवान को मंज़ूर नहीं था ।"
यानि जो अच्छा हुआ उसका कर्ता मैं और जो ग़लत हुआ उसका कर्ता भगवान ।वाह रे इन्सान ? और वाह रे तेरी फ़ितरत ?
Wednesday, 10 June 2015
कर्म का स्वरूप
गीता में कहा गया है,
"नेहाभिक्रमनासोअस्ति प्रत्यायो न विद्यते
स्वलपम् अपि धर्मसय त्रायते महतो भयात्"
करम को तीन भागो में बाँटा गया है १-संचित २-क्रियमाण ३-प्रारबध ।
आप जो इस जीवन में कर रहे हो,वह क्रियमाण करम है ।अनगिनित जीवनों के करम,जिनका भोग अभी तक आपने नहीं भोगा है,संचित की श्रेणी में आएँगे और इन संचित करमों में से छाँटकर आपके इस जीवन का प्रारबध (भाग्य) बना है ।आप पुरुषार्थ (क्रियमाण) के द्वारा संचित करमों को तो नष्ट कर सकते हो पर प्रारबध का भोग तो आपको भोगना ही पड़ेगा । इस प्रारबध के भोग से रामकृष्ण
परमहंस जैसे महापुरुष भी नहीं बच पाए । उन्होंने इस भोग को प्रसन्नता के साथ भोगा है क्योंकि वे जानते थे कि यह भोग भोगने से ही नष्ट होगा ।
अब प्रश्न यह उठता है कि पुरुषार्थ क्या है ? और इसका क्या महत्व है ? तो इसके लिए शुरु में कहा गया श्लोक काफ़ी कुछ स्पष्ट कर देता है । जो भी आप इस जनम में सत्करम या धर्म (जो धारण करने योग्य है,वही धर्म है) करोगे, वह कभी भी नष्ट नहीं होगा और वह आपको बहुत बड़े-बड़े भयों से मुक्त कर देगा । इससे होगा क्या ? इससे यह होगा कि आपका अगला जनम इस जनम की पूँजी के साथ शुरू होगा ।
"प्राप्य पुण्य कृताम् लोकानिषतवा शाश्वती समा:
शुचीनाम् श्रीमताम् गेहे योगभ्रष्टो अभिजायेते"
"अथवा योगिनाम् कुले भवति धीमताम्"
इसमें कहने के लिए बहुत कुछ है । पर बहुत कुछ कहकर या जानकर भी विश्वास और श्रध्दा के साथ यदि जीवन में उसका अवतरण नहीं होता तो वह व्यर्थ ही है ।
"श्रध्दावान् लभते ज्ञानम् तत्पर: संयते इन्द्रिय:
ज्ञानम् लब्धवा पराम् नचिरेणाधिगचछति"
Tuesday, 9 June 2015
वर्षा रितु के आगमन पर
वर्षा अभी आई नहीं है केवल हल्की सी दस्तक ही दिये हैं कि कुमलहाए हुए मन मनसिज खिलने लगे हैं । काम ने अपना मायाजाल फैलाना शुरू कर दिया है । उम्र अपने बन्धन तोड़ने लगी है । पसीने की गन्ध,मिट्टी की सोंधी-सोंधी ख़ुशबू में मिलकर उसकी मादकता को द्विगणित करने लगी हैं । आम्र मंजरियों और पल्लवों के पीछे छिपकर काम ने,शिव को विचलित करने के लिए,(शब्द,स्पर्श,रूप,रस,गन्ध)के पॉच पुष्प बाण,अपने धनुष की प्रत्यंचा में चढ़ा लिए है । किसी भी समय उसकी प्रत्यंचा खिच सकती है और काम के ये अमोघ बाण आपको घायल कर सकते है । आपने इन बाणों से बचने की कोई तैयारी की है ? नहीं ! तो आपको कोई नहीं बचा सकता ।
शिव के पास तीसरा नेत्र होने के बाद भी इन बाणों ने,उनकी समाधि भंग करके,उन्हें विचलित तो कर ही दिया था । यह अलग बात है कि उन्होंने तीसरे नेत्र (ज्ञान) के द्वारा काम को जला दिया था और 'कामारि' कहलाए थे ।
सावन और भादौं दो ऐसे महीने होते हैं, जिसमें कामाग्नि जितनी ही तीव्र होती है, जठरागनि उतनी ही मंद होती है,इसीलिए हमारे पूर्वजों ने हमको शारीरिक अस्वस्थता से बचाने के लिए सावन में (कामारि) शिव की उपासना (जिसमें व्रत भी शामिल है),को विशेष फलदायक बताया है । यह दोनो महीने विशेष त्योहारों के हैं । रक्षाबन्धन भी इसमें ही पड़ता है । पहिले गृहणियाँ सावन के पूरे महीने,मायके में ही रहती थी और पति-पत्नी के दूर-दूर रहने के कारण दोनो पूर्ण स्वस्थ रहते थे ।महा-योगेश्वर कृष्ण का जनम भी अभी ही पड़ता है ।जन्माष्टमी का व्रत भी विशेष फलदायक है ।
हमारी संस्कृति की एक महत्वपूर्ण विशेषता,उसकी उत्सवधर्मिता है ।हम इन उत्सवों का पूर्ण आनन्द तभी ले सकते हैं,जब हम मानसिक और शारीरिक रूप से पूर्णत: स्वस्थ और प्रसन्न हो । आईए हम पूरी तैयारी के साथ वर्षा के झोंकों का और सावन के झूलों का आनन्द लें । मेघों के रसा वर्षण के रस में पूरी तरह डूब जाने का निमंत्रण,प्रकृति अपनी दोनों बॉंहे फैलाकर हमें दे रही है । आइए उसके आलिंगन में कुछ समय के लिए हम अपने अहं का तिरोहण कर, भार मुक्त हो जाएँ ।
Saturday, 6 June 2015
मेरा कन्हैया
मेरी मॉं ने बचपन में संस्कार दिये थे कि पुण्य और पाप दोनों कहने से नष्ट हो जाते हैं,अत: पाप दूसरों से बता देना चाहिए और किए हुए पुण्यों को छिपा जाना चाहिए । बड़े होने पर शास्त्रों ने भी इसको पुष्ट किया । आज उसी संस्कार के वशीभूत होकर, कल अनजाने में ही हुए एक पाप की चर्चा के लिए,आपसे मुखातिब हूँ । कल से,मैं काफ़ी उद्विग्न हूँ । आज सुबह ध्यान (मेडीटेशन) में भी मन इसी का चिन्तन करता रहा,अत: ध्यान हुआ ही नहीं । चूँकि इस पाप में कुछ भूमिका 'आनन्द सभा' की भी है,अत: सुबह की दिनचर्या से निवृत्त होने के बाद,सबसे पहिला काम आपसे मुख़ातिब होने का कर रहा हूँ ।
इस समय मैं बंगलौर में अपनी बड़ी बेटी के घर में हूँ । मेरी नातिन साढ़े चार साल की है और नाती डेढ़ वर्ष का है । बंगलौर की पिछली यात्रा में,मैं नाती को खिलाते समय,उसे विभिन्न जानवरों की आवाज़ें सुनाने की ग़लती कर बैठा । नतीजा यह हुआ कि उसे कुत्ते के भौं-भौं की आवाज़ इतनी पसन्द आ गयी है कि अब मेरी पहचान,उसके लिए,"भौं-भौं वाले नानू" के रुप में सीमित होकर रह गयी है । मैं भी,उसमें अपने बाल कृष्ण का दर्शन करके दिन भर आह्लादित रहता हूँ । वह पूजा-पाठ के समय मेरी गोद में आकर बैठ जायेगा,आँखे बन्द कर लेगा,जैसे गहरे ध्यान में डूबा हो । मेरे शंख बजाने पर जहाँ भी होगा,भागकर आएगा और जब तक मैं उसके होंठों से शंख लगा नहीं दूँगा और वह शंख बजाने की तृप्ति अनुभव नहीं कर लेगा,मेरा पल्ला नहीं छोड़ेगा । मैं,उस पर कभी नाराज़ नहीं होता और इसी अहोभाव में रहता हूँ कि मेरे आराध्य ही बाल स्वरुप में मेरे ऊपर करूणा कर रहे हैं ।
कल हुआ यूँ कि मेरी नातिन के स्कूल की छुट्टी थी और दोनो भाई-बहिन मस्ती करने के मूड में थे । मैं 'आनन्द सभा' के एक विचारपूर्ण आलेख पर,टिप्पणी लिखने जा ही रहा था कि दोनो मेरे पास आकर "भौं-भौं" की आवाज़ निकालने की ज़िद करने लगे । मैंने कहा पॉंच मिनट रुक जाओ । नातिन बड़ी है,वह तो मान गयी पर नाती सरकार कहॉं मानने वाले थे ? एक बार तो मन हुआ कि 'आई-पैड' बन्द करके इनकी फ़रमाइश पूरी कर दूँ,फिर लगा कि यह विचार दिमाग़ से निकल जाएगा ।यह सोचकर नाती राजा को मनाने का प्रयास किया पर बाल-हठ तो बाल-हठ ही होता है । कन्हैया ने ग़ुस्से में आकर मटकी फोड़ दी थी,इस कन्हैया को मटकी कहॉं से मिलती ?तो इन जनाब ने,जो भी दो-तीन दाँत इनके मुँह में थे,पूरी ताक़त से मेरे पैरों में गड़ा दिए ।मैंने ज़ोर से डॉंट दिया,अब साहब,कुछ पल के लिए तो वे सहमे और इसके बाद,उनका जो रुदन-नाद शुरू हुआ,वह मेघ-गरजना को भी लज्जित करने वाला था । मैंने घबड़ाकर 'आई-पैड' बन्द कर के गोद में उठाया । गोद में इस क़दर मचलने लगा कि नीचे उतारना पड़ा ।जब लगातार दो मिनट तक भौं-भौं किया,तब जाकर कहीं उनका महारुदन बन्द हुआ ।इसके बाद जब दुबारा भौं-भौं किया,तब कहीं जाकर,उनकी,खिल-खिलाहट,कानों को नसीब हुई ।
वह तो सब कुछ तुरन्त भूल गया,पर मैं इस आत्म ग्लानि सें दंशित हूँ कि मुझसे अपने कन्हैया को 'सहमाने' और 'रुलाने' का अपराध कैसे हो गया ?
Thursday, 4 June 2015
मैगी की बदनामी पर ।
आज सारा ज़माना 'मैगी' के पीछे पागल हो रहा है । टी०वी० में,अख़बार में,इन्टरनेट में,इस समय केवल तेरी ही चर्चा है ।तेरी ख्याति तो पहिले ही पूरे संसार में फैली हुयी थी,अब तो दिग-दिगंत तक,तू ही तू व्याप्त हो रही है ।रशक होता है मुझे तुझसे,काश ईश्वर ऐसा सौभाग्य सब को प्रदान करे ।मुझे एक शेर का टुकड़ा याद आ रहा है,"क्या बदनाम होगें तो नाम न होगा?"
प्रिय 'मैगी' तम इतनी देर से इस देश में क्यों आईं ?जब मैं लहसुन,प्याज़ और packed food छोड़ चुका था । थोड़ा पहिले आ जाती तो कम से कम मेरे अधर और जिह्वा भी तेरे रसास्वादन से वंचित तो न रह जाते ? कितना अभागी हूँ मैं ? कि मिलन के बग़ैर ही वियोग का दुख झेलना पड़ रहा है ।
'मैगी' तू इस दुख: में अपने को अकेली मत समझना ।इस विपदा में पूरा देश जार-जार रो रहा है ।माताएँ दुखी हैं कि अब कैसे वे अपने पालितों की तीव्र क्षुधा को २ मिनट में शान्त कर पायेगीं ? बच्चे दुखी हैं कि उन्हें फिर से उसी पारम्परिक भोजन पर निर्भर होना पड़ेगा ? तेरी जैसी वैविध्यता पारम्परिक भोजन में कहॉं ? और अगर हो भी तो 'मम्मी' बनाना नहीं जानती तो क्या फ़ायदा ?सबसे ज़्यादा दुखी हैं,'पुरुष'। उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि पत्नी के बाहर चले जाने पर या रूठ जाने पर,जो उनका साथ देती थी,वही छोड़कर जा रही है तो अब वे किसके कन्धे का सहारा लेगें ? क्षात्रावास में रहने वाले भी दुखी हैं कि अब तक तो वे 'मेस' के बे-सवाद खाने के ज़ायक़े को ठीक करने के लिए जिसकी शरण में जाते थे,वही नहीं रहेगी,तो उनका क्या होगा ?
हमारा देश भी अजीब है ?पृदूषित जल पी लेगें, रासायनिक दूध पी लेंगे,सब्ज़ी खा लेगें,अन्न खा लेगें और डकार भी नहीं लेगें ।आज़ादी के बाद से इतने बार धोखा खाने के बाद भी उन्हीं धोखेबाज़ों पर विश्वास कर लेगें पर 'नेसले' पर विश्वास नहीं करेंगे ।हद हो गयी दोहरे चरित्र की ।
'मैगी' यह तेरे धैर्य की परीक्षा है ।तू घबड़ा मत ।तू अकेली नहीं है ।"धीरज,धर्म,मित्र अरु नारी,आपत्काल परखिहि चारी"।तेरे चाहने वाले बहुत हैं,वे किस दिन काम आएँगे ? तुझे अपने जन्मदाताओं पर विश्वास रखना चाहिए,वे तुझे बचाने के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा देंगे क्योंकि उनके घरों में चूल्हा तेरी वजह से ही जलता है,तेरी रोशनी से ही उनके घरों के चिराग़ रोशन होते हैं ।
Tuesday, 2 June 2015
मूरख हृदय न चेत जो गुरु मिलहि विरंचि सम ।
मैंने आज से लगभग १५ वर्ष पूर्व,जब गम्भीरता से अपने धर्म शास्त्रों का अनुशीलन प्रारम्भ किया तो हर शास्त्र के आख़ीर में,मुझे यह मुमानियत बहुत अजीब सी लगी कि इन शास्त्रों का पठन-पाठन या इन पर चर्चा उन व्यक्तियों से न की जाए,जिनका प्रभु चरणों में अनुराग न हो,यानि कि नास्तिक हों । इस सम्बन्ध में रामचरितमानस और गीता की कुछ पंक्तियॉं उल्लेखनीय हैं,
"यह न कहिअ सठही हठसीलहि,जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि
कहिअ न लोभिहि क्रोधिहि कामिहि,जो न भजइ सचराचर स्वामिहि"
(मानस के अन्त में शिव जी पार्वती जी को सम्बोधित करते हुए,यह मुमानियत कर रहे है कि इस कथा को,उन व्यक्तियों से न कहा जाय,जो सठ हों,हठशील हों और हरि की लीलाओं में जिनका मन न लगता हो तथा ऐसे व्यक्ति भी जो क्रोधी हों,लोभी हों,कामी हो और जो पूरे ब्रह्माण्ड के स्वामी का भजन न करता हो,से भी इस कथा को न कहा जाय)
तो फिर इस कथा के सुनने के पात्र कौन हैं?
"राम कथा के तेइ अधिकारी,जिनके सतसंगति अति प्यारी
गुर पद प्रीति नीति रत जेई,द्विज सेवक अधिकारी तेई
ता कहँ यह विशेष सुखदाई,जाहि प्रानप्रिय श्री रघुराई"
(इस कथा को सुनने के अधिकारी वे हैं,जिनको सतसंगति अति प्यारी हो,जिनकी गुर चरणों में प्रीति हो,जो नीति रत हों,द्विज सेवक हों ।जिनको राम प्राणों से भी अधिक प्रिय हों,उनको यह विशेष सुख प्रदान करने वाली है)
"इदं ते नातपसकाय नाभक्ताय कदाचन
न चाशुश्रूषवे वाचयं न च मां यो अभयसूयति"
(यह गुहयज्ञान उनको कभी न बताया जाय जो न तो संयमी हैं,न एकनिष्ठ,न भक्ति में रत हैं,न ही उसे जो मुझसे द्वेष करता हो)।
मुझे लगा कि इस ज्ञान की सबसे ज़्यादा आवश्यकता तो उन्हीं लोगों को है,जिनको इसकी मुमानियत की गयी है ।मेरी बुद्धि यह स्वीकार करने के लिए भी तैयार नहीं थी कि यह मुमानियत अर्थहीन है ।यह प्रश्न मन को मथते रहे ।जब मैं अपने इस जनम के गुरु,स्वामी जी के सम्पर्क मे आया तो मैंने उनसे इन प्रश्नों का समाधान चाहा तो उन्होंने जो समाधान दिया वह इस प्रकार है ।
हर मनुष्य का बौद्धिक स्तर अलग-अलग होता है ।एक स्तर है जिसे सठ कहा जाता है,उसके सुधार की गुंजाइश रहती है,"सठ सुधरहिं सतसंगति पाई,पारस,धातु-कुधातु सुहाई"अर्थात इस स्तर के व्यक्ति,सत्संग के प्रभाव से उसी तरह से सुधर जाते हैं,जैसे पारस के सम्पर्क में आने से लोहा,सोने में परिवर्तित हो जाता है ।
दूसरे स्तर के व्यक्ति हैं,'मूर्ख' ।इनको यदि ब्रह्मा भी गुरु के रूप में मिल जायें तो भी उनमें उसी प्रकार परिवर्तन असम्भव है,जैसे मेघ यदि अमृत भी बरसाएँ तो भी बेंत(बॉंस) के पेड़ पर फूल और फल नहीं आ सकते ।"मूरख ह्रदय न चेत,जो गुरु मिलहिं विरंचि सम ।फूलहिं-फलहिं न बेंत,जदपि सुधा बरसहिं जलधि"
एक तीसरा स्तर भी है और वह है'खल' का ।और इनके लिए कहा गया है कि इनका त्याग स्वान की तरह कर देना चाहिए,"खल परिहरिहिं स्वान की नाईं"
स्वामी जी ने कहा कि हमारे ग्रन्थों में इसीलिए नास्तिकों को,इसकी चर्चा करने से मना किया गया है,क्योंकि वे तुम्हारी बात मानेंगे नहीं ।तरह-तरह के तर्क-वितर्क करेगें,उनसे बात कर के तुम अपनी ऊर्जा और समय का विनाश ही करोगे और इससे उनका भी कोई भला नहीं होना ।आत्म साक्षात्कार या प्रभु का ज्ञान बिना श्रध्दा के सम्भव नहीं है ।वह तर्क ,मन,बुद्धि और वाणी से भी परे है,"राम अतर्क,मन,बुद्धि,बानी" तथा"श्रध्दावान् लभते ज्ञानम् तत्पर: संयते इन्द्रिय:
ज्ञानम् लब्धवा पराम् शान्ति नचिरेणाधिगचछति"
Subscribe to:
Posts (Atom)