Friday, 23 August 2013

आने वाले खतरे से अनजान पीढ़ी

                                                          कई महीनों  से मन न तो कुछ देखना चाहता है, न कुछ सुनना चाहता है और न ही कुछ लिखना चाहता है, न कुछ समझना चाहता है और न ही कुछ समझाना चाहता है । एक अजीब सा सूनापन, एक अजीब सी रिक्तता जीवन में आ गयी है । जीवन निरर्थक लगने लगा है । उद्देश्यहीन, उत्साहहीन जीवन अपनी नियति बनता जा रहा है । रामायण और गीता का पाठ जहाँ पहिले अन्दर तक सिक्त कर देता था वहाँ अब मात्र समय काटने का वाचिक उपक्रम मात्र बन कर रह गया है । पत्नी कभी-कभी हँसी में कह देती है कि स्वामीजी की बीमारी के समय बहुत शिकायत करते थे कि दो वर्षों से कहीं जा नहीं पाये । स्वामी जी ने तुम्हे अपने बंधन से मुक्त कर दिया, अब उनके जाने के बाद से लगातार घूम ही रहे हो, अब क्यों मन नहीं लगता ? जब कि वह जानती है कि इसका कारण स्वामीजी का विष्णुलोक गमन ही है | उसी की प्रेरणा से आज फिर से आपसे मुखातिब हूँ ।                                                                                                                                                               
                                                          मैं आधुनिकता का विरोधी नहीं हूँ और यदि विरोधी होऊं, तब भी समय को रोकना किसी के वश में नहीं है । हर आने वाली पीढ़ी, पुरानी पीढ़ी से ज्यादा आधुनिक होती है । पीढ़ी बदलने के साथ सामाजिक तथा नैतिक मूल्य भी बदलते हैं, यह भी ध्रुव सत्य है ।                                                                                                      पुरानी पीढ़ी, नई पीढ़ी का विरोध करे, इसे भी मैं सही नहीं समझता । बेहतर यही होता है कि वह सामंजस्य स्थापित करे । हाँ इसके साथ-साथ मैं यह भी आवश्यक समझता हूँ कि जहाँ उसे लगे कि उसका चुप रहना, उसे अपनी ही नजर में गिराने लगा है तो उसे अपनी चुप्पी तोड़कर अपनी बात कह देना चाहिये नहीं तो वह स्वयं अपराधबोध से ग्रसित हो जायेगा । इसके साथ-साथ मैं यह भी कहना चाहूंगा कि उसे अपने को मानसिक अवसाद से बचाने के लिये, अपनी बात को कहने का अधिकार तो है पर उस बात को मानने का आग्रह रखना, नए मानसिक अवसाद को निमंत्रित करना होगा, अत: इससे बचना चाहिये ।                                                                                                                                                                                                               हमारे शास्त्र, हमारा लोक साहित्य एवं पुरातन वांग्मय हमेशा से इस बात को कहता रहा है कि व्यक्ति जिस प्रकार का भोजन करेगा, जिस प्रकार का साहित्य पढ़ेगा, जिस प्रकार के दृश्य देखेगा, जिस प्रकार का संग करेगा, जिस प्रकार का चिंतन करेगा, वैसा ही उसका मन बनेगा । हमारी पौराणिक कथाएँ इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं कि जीव के संस्कारों का निर्माण माँ के गर्भ से ही प्रारंभ हो जाता है । 
                                                          अब इन्ही सब तथ्यों को आधुनिक विज्ञान भी पूरी तरह से प्रमाणित कर रहा है, फिर भी वर्तमान पीढ़ी इन तथ्यों से पूरी तरह आँख मूंदे हुए है । जो सोया हुआ हो,उसे तो जगाया जा सकता है पर जो सोने का नाटक कर रहा हो, उसे कौन जगा सकता है ? अपने को अत्याधुनिक प्रदर्शित करने के चक्कर में वह क्या खो रहे हैं ? जब तक इस तथ्य का साक्षात्कार उन्हें होगा तब तक बहुत देर हो चुकी होगी । फिर पछतावे के अलावा क्या बचेगा ? 
                                                    
                                                   

Wednesday, 12 September 2012

कात्यायनी (ख़ुशी) के तृतीय जन्मदिन पर

आज
तुम्हारा जन्म दिन है
मेरी लाडली
और
मुझे
याद आ रहा है
वह घटनाक्रम
जो आज भी
स्मृतियों में
इस तरह जीवंत है
जैसे कल ही घटा हो
यह सब कुछ
आश्रम में
बैठे थे
हम
कि तभी तुम्हारे पापा का आया था
फ़ोन
उत्तेजना, निराशा और घबराहट
से परिपूर्ण स्वर में
तुम्हारे पापा ने बताया था
हमें
कि
कुछ दुश्वारियां आ जाने के कारण
तुम्हे गर्भ में ही ख़त्म करने की सलाह
दे रही है डॉक्टर
तुम्हारी दादी ने की थी
फ़ोन पर
डॉक्टर से बात
डॉक्टर ने
किया था निर्देशित
तुरंत निर्णय लेने के लिए
अनिर्णय की स्थिति   में
कुछ भी घटित होने की चेतावनी देते हुए
यह भी कहा था
कि यदि आप लोग गर्भ रोकने का निर्णय लेते हैं
तो बच्चे के विकलांग पैदा होने की पूरी सम्भावना है
घबड़ा गए थे हम पूरी तरह से
स्वामी जी को जैसे ही पूरी बात बतायी
मुझे आज भी याद है
स्वामी जी का वह तमतमाया  हुआ चेहरा
वह थरथराती हुई आवाज
"तुम और तुम्हारी डॉक्टर भगवान बन गए हो
तुम लोग निर्णय लोगे
कि
किस जीव को धरती पर आना है किसे नहीं ?"
हमने डरते हुए बताया
कि पैदा होने कि स्थिति में
बच्चे के विकलांग होने की पूरी सम्भावना है
वह पूरे विश्वास के साथ बोले
कि मैं गारंटी लेता हूँ
बच्चे को कुछ नही होगा
वह पूरी तरह स्वस्थ और मेधावी होगा
इतना कहकर
वह उठे थे तेजी से
आश्रम के बाहर
धार्मिक पुस्तकों की दूकान से
लेकर लौटे थे वे
"संतान गोपाल स्त्रोत"
इस पुस्तक के दसवें श्लोक पर
अपने हाथ से लगाकर निशान
पुस्तक
मुझे देते हुए
बोले
कि तुम्हे नित्य पाठ करना है
इसका
और दसवें श्लोक की माला
कम से कम एक बार अवश्य जपनी है
और ख़ाली समय में मौन होकर निरंतर जप करना है
श्लोक को जाग्रत करने की प्रक्रिया बताते हुए
उन्होंने आश्वस्त किया कि प्रभु कृपा करेंगे
और सब कुछ शुभ होगा
और इस तरह  तुम माँ के गर्भ में ही
काल को पराजित करके
धरा पर अवतरित हुई थी
मेरी माँ, मेरी दुर्गा, मेरी कात्यायनी

मुझे
यह भी  याद है कि जब हमने
स्वामी जी को तुम्हारे जन्म का समाचार दिया था
तो वह खुश  होकर बोले थे
कि यह तुम सब के जीवन में खुशियाँ लेकर आई है
अत: इसका नाम ख़ुशी होगा
आज के दिन
मेरे गुरु, मेरे पिता मेरे भगवान
विष्णु लोक से यही आशीर्वाद दे रहे हैं
कि तुम अपने पवित्र आचरण से
अपने संपर्क में आने वाले हर प्राणी के जीवन को
खुशियों से भर देना
मेरी बच्ची
महर्षि कत्य के तप से प्रसन्न होकर
माँ ने महर्षि को
मनचाहा वरदान देते हुए कहा था
मैं आपकी इच्छा अनुसार
आपकी पुत्री के रूप में ही दुष्टों का संहार  करने के लिए
धरा पर अवतरित होउंगी
और मेरा नाम आपके नाम पर ही कात्यायनी    होगा
अपने नाम ख़ुशी और कात्यायनी  को सार्थक करना
मेरी लाडली
आज के दिन मेरा भी यही आशीर्वाद  है |



Thursday, 21 June 2012

सो माया बस भयो गोसाईं, बंध्यो कीर मरकट की नाईं

                                                          जब भी किसी उम्रदराज व्यक्ति से मुलाकात होती है तो हर बुजुर्ग आदमी की यही शिकायत होती है कि वह अब सब कुछ छोड़कर भगवान का भजन करना चाहता है, पर वह करे तो क्या करे ? यह संसार उसे छोड़ता ही नहीं है । जब वह  यह कहता है तो मुझे मानस की यही पंक्ति,"सो माया बस भयो  गोसाईं, बंध्यों कीर मरकट की नाईं ।" याद आ जाती है । हम सभी मानवों की यही हालत है ।
                                                          जब जीव इस धरती पर आता है तो वह आकाश से गिरने वाली पानी की बूंद की तरह पवित्र,निर्मल और स्वच्छ होता है पर जैसे ही यह पवित्र बूंद धरती का स्पर्श करती है, मटमैली हो जाती है । उसी प्रकार यह जीव भी जैसे ही धरती का स्पर्श करता है, माया आकर उससे लिपट जाती है,"भूमि परत भा ढाबर पानी,जिम जीवहिं माया लिपटानी" और फिर यह माया जीव से पूरे जीवन भर किसी न किसी रूप में लिपटी ही रहती है । कभी माँ-बाप के रूप में, कभी प्रेमी -प्रेमिका के रूप में, कभी पत्नी और बच्चों के रूप में, कभी सुन्दरता के रूप में,कभी ज्ञान और पद के अहंकार के रूप में,कभी दानी और त्यागी के रूप में,कभी साधू और सन्यासी होने के अहंकार के रूप, यानि यह माया किसी न किसी रूप में जीव से लिपटी ही रहती है ।
                                                             जीव नित्य मुक्त है । पर माया के आवरण के कारण वह अपने को कीर और मरकट की तरह यह मानता है कि संसार उसे पकडे हुए है । जब कि वास्तिविकता यही है कि संसार उसे नहीं पकड़े,वही संसार को पकड़े हुए है । शिकारी तोते{कीर}को पकड़ने के लिए एक रस्सी के ऊपर पोपली [पोला बांस] चढ़ा देता है और नीचे तोते का प्रिय खाद्य मिर्च डाल  देता है । तोता जैसे ही मिर्च के खाने के लालच में पोपली के ऊपर बैठता है, पोपली पलट जाती है और तोता सिर के बल नीचे लटक जाता है । तोता यह समझता है कि पोपली ने उसे पकड़ लिया है, जब कि वास्तविकता यह है कि वह पोपली को पकड़े हुए है । वह पोपली को छोड़ दे तो वह नित्य मुक्त है पर वह माया के आवरण के कारण पोपली को छोड़ नहीं पाता और यह काल रूपी शिकारी उसे पकड़ कर अपने साथ ले जाता है ।
                                                               ठीक यही स्थिति मरकट [बंदर] की होती है । शिकारी उसको पकड़ने के लिए, एक सकरे मुंह का घड़ा[सुराही], जमीन में गाड़ देता है और उस घड़े में बंदर का प्रिय खाद्य [चने] डाल देता है ।बंदर चने के लालच में घड़े में हाथ डालकर, चने अपनी मुट्टी में भर लेता है । अब मुट्टी सुराही  का मुहं सकरा होने के कारण, निकल नहीं पाती तो वह समझता है कि घड़े ने उसे पकड़ लिया है और तभी काल रूपी शिकारी आकर उसे पकड़ लेता है । यदि बंदर चनों का लालच छोड़ कर  मुट्टी खोल दे तो वह जीव की तरह नित्य मुक्त तो है ही ।
                                                                इसी माया के आवरण के कारण जीव समझता है कि संसार उसे पकडे हुए है, जबकि वास्तविकता यही है कि जीव संसार को पकडे हुए है । जीव पुरुषार्थ के द्वारा इस माया के पार नहीं जा सकता । इसके लिये उसे प्रभु की शरणागति स्वीकार करनी पड़ेगी, तभी वह इस माया के आवरण को भेदने में समर्थ हो सकेगा । भगवान गीता में स्पष्ट घोषणा कर रहे हैं,"मामेव ये प्रपद्यन्ते, मायामेतां तरन्ति ते" पर हम भगवान को तो मानते है पर भगवान की कही बात पर विश्वास नहीं करते । यही हमारे दुःख का कारण है । इसके लिए हम ही दोषी हैं, कोई दूसरा नहीं ।

                                                                 शेष प्रभु कृपा ।


Monday, 18 June 2012

ईश्वर अंश जीव अविनाशी

" ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन,अमल,सहज सुख राशी |" यह जीव ब्रह्म की ही तरह अविनाशी है | इसका कभी भी नाश नहीं होता | नाश शरीर का होता है आत्मा का नहीं | "वासांसि जीरणानि   यथा विहाय,नवानि गृह्णाति नारोपराणि | तथा शरीराणि विहाय जीर्ण|न्यन्यानि  संयाति नवानि देहि |" जिस प्रकार नर, वस्त्र पुराने हो जाने पर, नए वस्त्र ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार जीव, शरीर पुराना हो जाने पर, नया शरीर ग्रहण कर लेता है | इसी तरह जैसे ब्रह्म शाश्वत है,उसी तरह जीव भी शाश्वत है | जन्म शरीर का होता है,नाश शरीर का होता है,जीव का नहीं,"न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूय: | अजो नित्य: शाश्वतोयम पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे |"  इसलिए जिस तरह ब्रह्म का कभी भी नाश नहीं होता, उसी प्रकार जीव का भी कभी नाश नहीं होता |
                                                                               जिस प्रकार से ईश्वर या ब्रह्म चेतन है उसी प्रकार जीव भी चेतन है | जीव के चेतन होने का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि शरीर से जीव के निकल जाने के बाद, शरीर जड़ हो जाता है | इसका अर्थ यही हुआ कि शरीर में जो चेतनता थी, उसका कारण जीव था | जिस तरह से सारी प्रकृति जड़ है | इस जड़ प्रकृति को चेतनता प्रदान करती है,ब्रह्म की उपस्थिति | ब्रह्म के प्रकाश से ही, प्रकृति प्रतिभासित होती है,उसी प्रकार जीव की उपस्थिति ही जड़ शरीर को प्रतिभासित करती है |
                             
                                                  जिस प्रकार ब्रह्म अमल है | यानि मल रहित या विकार रहित है | उसी प्रकार जीव भी अमल है,यानि मल या विकार रहित है | जीव जब ब्रह्म से उसके अंश के रूप में धरती पर आता है तो वह अपने मूल की ही तरह अमल एवं विकार रहित होता है | जिस तरह पानी की बूंद जब बादल से अलग होती है तो वह एकदम शुद्ध होती है पर धरती का स्पर्श होते ही वह मटमैली हो जाती है उसी प्रकार जीव के  भी धरती पर आते ही, माया उससे लिपट जाती है | " भूमि परत भा ढाबर पानी. जिम जीवहि माया लिपटानी |"
                                                                                 जिस प्रकार ब्रह्म सहज है उसी प्रकार जीव भी सहज है | जीव में असहजता आती है माया के कारण | माया का विस्तार इतना व्यापक है कि उससे पार पाना जीव के लिए पुरुषार्थ के द्वारा संभव नहीं है, इसके लिए जीव को प्रभु के शरण में जाना ही पड़ेगा, "मामेव ये प्रपद्यन्ते, मायामेतां तरन्ति ते"  
                                                                                 जिस प्रकार ब्रह्म  सुख की राशि है, उसी प्रकार जीव भी सुख की राशि है | ब्रह्म को वेदों ने "रसो वै स:" यानि ईश्वर या ब्रह्म, रस यानि आनंद का ही स्वरुप है | ईश्वर को सुख का सागर कहा गया है और इसी सुख के सागर से ही हमारी उत्पत्ति हुई है | जिस वस्तु की उत्पत्ति जहाँ से होती है, उसे अपने उद्गम स्थल से मिलकर अपार सुख का अनुभव होता है | दीपक की लव में प्रकाश सूरज का ही अंश है, इसलिए दीपक की लव उर्ध्वमुखी होती है,अपने उद्गमस्थल सूर्य से मिलने के लिए आतुर, क्योंकि उससे मिलकर अपने अस्तित्व का तिरोहण करने में ही उसे सुख की अनुभूति होती है | इसी प्रकार जल की उत्पत्ति सागर से होती है अत: जल के हर बूंद की यही कामना होती है कि वह सागर में मिलकर अपने अस्तित्व की समाप्ति कर दे क्योंकि इसी में उसे सुख की अनुभूति होती है |
                                                                                   यह विषय इतना व्यापक है कि वेदों ने भी नेति-नेति कहकर अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी है, अत: मैं अपने जीवन के अनुभव के आधार पर कुछ बातें आपसे कहकर अपनी बात समाप्त  करता हूँ | जैसा कि उपरोक्त से यह स्पष्ट हो गया है कि हम उस ईश्वर के अंश के रूप में इस धरती पर आये हैं जो चेतन है,अमल है,सहज है और सुख की राशि है | पर धरती पर आते ही माया के वशीभूत होकर हम संसार में सुख की तलाश कर रहे हैं | हर जीव संसार में जो भी कर रहा है वह कर सुख के लिए ही रहा है | आप मकान बनवाते हो यह मानकर की यह आपको सुख देगा | आप धन इकट्टा करते हो यह सोचकर कि यह आपको सुख देगा | आप शादी करते हो यह मानकर कि पत्नी आपको सुख देगी | आप बच्चे पैदा करते हो यह मानकर कि यह आपको सुख देंगे | आप दान करते हो यह सोचकर कि इससे आपको यश मिलेगा, समाज आपको सम्मान देगा और उसमे आपको सुख मिलेगा | आप शराब भी पीते हो तो इसीलिए कि उसमे आपको सुख मिलता है | यह सब हम जो भी संसार में करते है वह सुख के लिए ही करते है क्योंकि सुखसागर से हमारी उत्पत्ति हुई है | हम भी सुख स्वरुप है | पर मेरे मित्रो यह सारा का सारा सांसारिक सुख ह्रास्य्मान है | इसके प्राप्त होते ही इसका क्षरण शुरू हो जाता है | एक उपनिषद् कहता है कि सारे संसार का राज्य,सारे संसार का वैभव, सारे संसार का सौंदर्य,सारे संसार का ज्ञान भी अगर प्राप्त हो जाये तो" तत: किम" | इस" तत: किम " में ही आपके समस्त प्रश्नों के उत्तर निहित है | आप के अंदर जिस दिन यह जिज्ञासा जग जाएगी कि "को अहम" उस दिन आप अपने उद्गमस्थल,सुखसागर की तलाश में निकल पड़ोगे और इसमें मिलने वाला सुख निरंतर वर्धमान होगा | इस यात्रा का समापन मूल उद्गमस्थल जो सुख का सागर है में अपने अस्तित्व के पूर्ण समर्पण से होगा और तब जीव कह उठेगा "सो अहम" |
                                                                                   आइये हम सब इस यात्रा का शुभारम्भ करें, भले ही हम इस जन्म में वहां तक न पहुँच पाए,पर कुछ कदम तो उस दिशा में चल ही लेंगे | अगले जन्म में यह कुछ कदम मंजिल की दूरी को कम करने में तो सहायक होंगे ही, क्योंकि भगवान गीता में स्पष्ट रूप से घोषणा कर रहे है,"नेहाभिक्रमनासोअस्ति प्रत्यवायो न विद्यते,स्वल्म अप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात" या "शुचीनाम श्रीमताम गेहे योग भ्रष्टो अभिजायते"
                                                                                    शेष प्रभु कृपा |

फादर्स डे पर

मुझे नहीं है याद अपने पिता की
क्योंकि जब उन्होंने शरीर छोड़ा था
तब मैं मात्र 6 माह का था  ।
माँ के पूजा भवन में रक्खी
उनकी एकमात्र फोटो ही
मेरी स्मृतियों में जीवित है ।

और जीवित है
माँ के द्वारा पिता के विषय में दी गयी जानकारी
कि वह इतने खूबसूरत थे कि शादी में उनके दूलह रूप को देखने के लिए
उमड़ आया था पूरा गाँव
कि मेरे पिता जितने शरीर से खूबसूरत थे
उससे भी ज्यादा खुबसूरत था
उनका मन ।
मैं आभारी हूँ
मैं अपने उस पिता का
जो मुझे इस धरती पर लाये थे ।
रक्त में मिले संस्कारों के लिए
मैं
कभी भी ऋण मुक्त नहीं हो सकता ।
पिता के जाने के बाद
मेरे सबसे बड़े भाई
जिनकी उम्र उस समय 12 वर्ष की थी
ने
कभी भी नहीं महसूस होने दिया
पिता का अभाव ।
माँ और बड़े भाई के रहते
मैंने कभी भी नहीं महसूस किया
अपने को अनाथ ।
हाँ
पहिले माँ और फिर बड़े भाई के जाने के बाद
मैंने पहिली बार महसूस किया था
अपने को अनाथ ।
इतना बड़ा शून्य मेरी जिन्दगी में आ गया था
कि जीवन निरर्थक लगने लगा था ।
पर तभी मेरे अकारण करुणा वरुणालय प्रभु
ने
मेरे जीवन के उत्तरार्ध में
भेज दिया गुरु के रूप में
मेरे उस पिता को जो मुझे 6 माह की उम्र में
छोडकर चले गये थे ।
मेरे प्रभु ने
ब्याज के साथ लौटाया था मेरे पिता को ।
जीवन भर पिता के वात्सल्य के लिये
तरसा मेरा मन
आप्लावित हो गया था
गुरु रूपी पिता के
अकथनीय,अतुलनीय
उस अनुराग से
जिसमें
पुत्र की गलतियों को
क्षमा करते हुए
वात्सल्य की कभी न खत्म होने वाली  शीतल वर्षा थी ।
और थी अपने शिष्य को
जीवन की सार्थकता का बोध करा देने की
आकुलता और व्याकुलता ।
जीवन के यह 8 वर्ष
यदि मेरे जीवन से निकाल दिए जाये
तो शेष शून्य ही बचेगा ।
अब
उनके जाने के बाद
अपने प्रभु से
समय-समय पर
पूंछता रहता हूँ
कि जब उनसे बिछड़ना ही मेरा प्रारब्ध था
तो उनसे मिलवाया ही क्यों था ?
                                                                                                             शेष प्रभु कृपा ।

Friday, 18 May 2012

मेरे गुरु की अतीन्द्रिय शक्तियां

    आज से करीब ९ वर्षों पूर्व मैं अपने इस जीवन के गुरु के संपर्क में आया था | संपर्क में आने की घटना भी इस तरह घटी कि मैं कार्यालय से घर लौट रहा था, रास्ते में मेरे एक मित्र का ऑफिस पड़ता था | मैंने सोचा कि अगर वह घर चलना चाहे तो उन्हें भी लेता चलूँ | हम दोनों के घर पास-पास ही थे | यह घटना संभवत: अक्टूबर,२००३ की है | मुझे प्रयाग आये तीन महीने हो चुके थे | मैं मित्र के ऑफिस पहुंचा तो मित्र खाली थे, मैंने उनसे घर चलने के लिए पूंछा तो वे बोले कि बैठो और इनसे मिलो यह है श्री लक्ष्मीनारायण जी, यह भागवत बहुत अच्छी कहते हैं | मैंने कहा कि ऑफिस तो खाली है कुछ अपने मित्र से सुनवाइये | लक्ष्मीनारायण जी ने पूंछा कि क्या सुनेंगे ? मैंने कहा कि" गोपीगीत " सुनाइये तो उन्होंने कुछ श्लोक सुनाये, बहुत ही अच्छा लगा | मैंने उनसे कहा कि अब आगे कब शुभ अवसर प्राप्त होगा ? तो उन्होंने कहा कि वे जब भी प्रयाग आते हैं तो सुबह संगम स्नान के बाद ब्रह्मचर्य आश्रम में स्वामी जी के पास जरुर बैठते हैं वहां पंडित रामकृष्ण शास्त्री भी आते है जो कि आज के समय के मूर्धन्य विद्वानों में है | स्वामी जी के सानिध्य में सत्संग हो जाता है | अत: यदि मैं सत्संग का एवं एक अच्छे महात्मा के दर्शन का लाभ उठाना चाहता हूँ तो कल सुबह वही आ जाऊं |
                                                                      इस तरह मैं स्वामी जी के सम्पर्क में आया | उनसे मिलने के बाद मुझे लगा कि प्रभु ने मुझे अपने गुरु से भेंट कराने के लिए ही,  प्रयाग की पवित्र भूमि में भेजा है | शुरू  में स्वामी जी ज्यादा  देर आश्रम में बैठने नहीं देते थे | मेरे साथ ही नहीं, अन्य नवागुन्त्कों के साथ भी वह यही करते थे | मैं अपनी पत्नी को भी साथ ले जाने लगा था | एक दिन घर से निकलते समय पत्नी ने कहा कि पहिले संगम चलेंगे तब स्वामी जी के पास आयेंगे | मैंने कहा ठीक है, पर पता नहीं कैसे हुआ कि मेरे दिमाग से यह बात उतर गयी और मैं सीधे आश्रम पहुँच गया | आश्रम में बाइक खड़ा भी न कर पाया था कि स्वामी जी ने अंदर से आवाज दी कि पहिले हम संगम हो आये, संगम में प्रणाम करने के बाद ही आश्रम आयें | हम दोनों आश्चर्यचकित रह गए कि इन्हें कैसे मालूम हो गया कि हम घर से पहिले संगम जाने की सोंच कर ही चले थे | इसी तरह एक दिन और हुआ घर से सोचकर चले कि पहिले हनुमान जी को प्रणाम करके तब स्वामी जी के पास बैठेंगे, उस दिन भी जाते ही स्वामी जी ने पूंछा कि हनुमान जी को प्रणाम कर आये ? हमने कहा कि अभी नहीं तो वे बोले कि पहिले हम हनुमान जी को प्रणाम कर आये तब उनके पास आये |
                                                                       आश्रम आना जाना शुरू  हो गया था पर ज्यादा देर रुकने नहीं देते थे | एक दिन पत्नी ने कहा कि आज जाने को कहें तो तुम उठना नहीं | मैंने कहा कि कहीं नाराज हो गए तो पत्नी ने कहा ऐसा कुछ नहीं होगा | हम गए, जब थोड़ी देर हो गयी तो उन्होंने जाने का इशारा किया पर हम अनदेखी करके बैठे रहे तो उन्होंने मुखर होकर पूंछ लिया कि अब जाओगे नहीं | मैं कुछ कहता कि इससे पहिले ही पत्नी बोल पड़ी, अभी थोड़ी देर और बैठेंगे | स्वामी जी खुल कर हँसने लगे | इसके बाद हमारा रास्ता खुल गया और एक दिन वह भी आ गया कि जब स्वामी जी चाहते थे कि हम उनके पास हमेशा मौजूद रहें |
                                                                        यह भी शुरुवात  की ही बात है मैं देखता था कि कभी भी कोई भी अभ्यागत भिक्षा की आशा से आश्रम आता था तो स्वामी जी उसका हृदय से स्वागत करते | यदि कोई गेरुआ वस्त्र में होता तो उसे स्वयम खड़े होकर प्रसाद खिलवाते और जैसे ही वह महात्मा प्रसाद पा चुकते तो स्वामी जी उनके सामने हाथ जोडकर खड़े हो जाते और उनसे पूंछते कि महाराज जी आपने प्रसाद पा लिया ? उनके यह पूंछने का अर्थ ही यही होता था की प्रसाद पा लिए तो अब बैठे क्यों है ? अपने गंतव्य की और प्रस्थान कीजिये | मुझे यह बहुत अजीब सा लगता की स्वामी जी प्रसाद तो बहुत प्रेम से पवाते है पर प्रसाद पाने के बाद किसी को भी दो मिनट आश्रम में रुकने नहीं देते | उनके इस कृत्य का औचित्य मेरी समझ से बाहर था ? तभी एक दिन आश्रम में मेरे अलावा जब कोई नहीं था, स्वामी जी अचानक इस तरह बोलने लगे कि जैसे आत्मालाप कर रहे हों, भाई मैं जो मेरे आश्रम में प्रसाद पाने कि इच्छा  से आता है उसे मैं यह समझ कर प्रसाद पवाता  हूँ कि इसके अंदर बैठे मेरे प्रभु ही प्रसाद पा रहे है | प्रसाद पाने के बाद मैं उसे रुकने इसलिए नहीं देता कि वह या तो अपने गुरु भाईयों की बुराई करेगा या अपने आश्रम की बुराई करेगा, उसे इस अपराध से बचाने के लिए और मेरे अंदर उसके साधुवेश को देखकर जो श्रद्धा उत्पन्न हुई है वह नष्ट न हो, इसलिए मैं प्रसाद पाने के बाद उसे रुकने नहीं देता | जिनको मुझे जानकारी होती है कि यह सत्संग के लिए रुकना चाहते है, उनके प्रति मेरा व्यवहार अलग होता है | अब किसी को अच्छा लगे या बुरा जो मैं ठीक समझता हूँ, वह करता हूँ | मैं समझ गया कि यह मेरे मन में उठ रहे प्रश्न का समाधान किया गया है | इसके बाद कभी भी मैंने उनके किसी भी कृत्य का औचित्य तलाशने का प्रयास नहीं किया | गुरु वशिष्ठ के मन में पहिले भरतजी को लेकर शंका पैदा हुई पर बाद में गुरु वशिष्ठ को यह कहना पड़ा," समुझब कहब करब तुम्ह जोई, धरम सारु जग होइहि सोई ||"
                                                              स्वामी जी ने एक बार बताया  था कि वह १३ वर्ष की उम्र में घर छोड़ दिए थे | शुरू में उन्हें तंत्र विद्या सीखने का शौक चढ़ा तो वह एक तांत्रिक के यहाँ जाना शुरू  ही किये थे कि तभी एक दण्डी सन्यासी ने उन्हें बुलाकर खूब डाटा और कहा कि तुम ब्राह्मण के घर में पैदा होकर यह निकृष्ट विद्या सीखना चाहते हो? तुम भगवान की सात्विक भक्ति करो वही तुम्हारे लिए कल्याणकारी होगी | स्वामी जी इसके बाद कभी भी तांत्रिक के यहाँ नहीं गए | पर जो वह कुछ दिन गए थे, उसका ज्ञान तो उनके मानस पटल पर अंकित था ही | स्वामी जी के पास जब भी कोई अपनी सांसारिक समस्याओं को लेकर आता था तो स्वामी जी या तो वैदिक मन्त्रों का जप करने को कहते थे या भगवान के नाम जप के लिए कहते थे या रामचरित मानस की कोई पंक्ति बताकर उसको जाग्रत करने का तरीका बताकर, उसका जप करने के लिए कहते थे | वह हमेशा यही कहते थे कि प्रभु से आर्त भाव से  मांगो, प्रभु तुम्हारे उपर अवश्य कृपा करेंगे | वह यह कभी नहीं कहते थे कि जाओ तुम्हारा काम हो जायेगा | वह यही कहते थे कि भगवान  आराधना तुम्हे स्वयम करनी पड़ेगी | ऐसा हो ही नहीं सकता कि तुम भगवान को सच्चे दिल से पुकारो और भगवान तुम्हारी आर्त पुकार को अनसुना कर दें |
                                                                मैंने ८ वर्षों में केवल दो बार उन्हें अपनी अतीन्द्रिय शक्तियों का प्रयोग करते हुए देखा | दोनों बार उनके पुराने शिष्यों को अपने लापता बच्चों की चिंता में बिलखकर रोते देखकर, वह मजबूर हो गए थे अपनी इन शक्तियों का प्रयोग करने के लिए | दोनों ही मामलों में शाम को ही वह लोग आये थे और दोनों को ही स्वामी जी ने अगली सुबह बुलाया था | इत्तिफाक से दोनों मामलों में मैं शाम और सुबह दोनों टाइम मोजूद था | एक मामले में स्वामी जी ने कोई स्पष्ट उत्तर न देकर,भगवान की आराधना करने और यह कहकर कि भगवान भला करेंगे, से बात को ख़त्म कर दिया था | उनके जाने के बाद जब मैंने स्वामी जी से पूंछा कि आपने स्पष्ट क्यों नहीं बताया तो स्वामी जी बोले कि क्या उसकी माँ अपने बच्चे के मृत्यु के समाचार को बर्दास्त कर पाती, उसका बिलखना तुम सुन नहीं रहे थे | अब कम से उसे बच्चे के आने की आशा, जीने के लिए संबल तो प्रदान करती रहेगी | दूसरे मामले में उन्होंने कह दिया था की बच्चा कल घर आ जायेगा और बच्चा आ गया | वे लोग बच्चे को लेकर स्वामी जो को प्रणाम करने लाये और स्वामी जी के परती आभार प्रदर्शन करते हुए कुछ धनराशि देनी चाही तो स्वामी जी बोले मैंने इसमें कुछ नहीं किया है | हनुमान जी की कृपा से तुम्हारा बच्चा वापस आया है, यह पैसा उठाओ और जाकर हनुमान जी को प्रसाद चड़ाओ | वह सारा प्रसाद गरीबों में बाँट देना | उनके बहुत आग्रह करने के बाद भी स्वामी जी ने उनसे कुछ ग्रहण नहीं किया | ज्यादा जिद करने पर स्वामी जी ने उन्हें तुरंत आश्रम से जाने के लिए कह दिया | उनके जाने के बाद स्वामी जी बोले इनके लिए मुझे वह करना पड़ा जो मुझे नहीं करना चाहिए था |
                                                                  शेष प्रभु कृपा |

Sunday, 13 May 2012

मदर्स डे पर ।

माँ,
जो स्वयं
सो कर
गीले में
सुलाती है
बच्चों को
सूखे में ।
माँ,
जो बच्चों को
चिपकाकर
सोती है
छाती से
और
कुनकुनाते ही बच्चों के
जाती है जग ।
माँ,
जो बच्चों को
कभी नहीं सुलाती
पीठ की तरफ
क्योंकि
उसे याद है
भगवान शंकर का वह आदेश
जिसमें उन्होंने कहा था अपने गणों से
कि जो माँ 
पीठ करके सोयी हो
बच्चों की तरफ
काटकर उसकी गरदन
जोड़ दो उसे
गणेश के धड के साथ ।
माँ,
जिसे हमेशा यह चिंता रहती है
कि लापरवाह है उसका बच्चा
खाने-पीने के प्रति
जिसके कारण वह होता जा रहा है
दुबला ।
माँ,
जो बच्चे से दूर होने पर   
करती रहती है
आत्मालाप
सुबह से शाम तक
पता नहीं
बहू ने नाश्ता बनाया होगा या नहीं ?
कहीं बगैर नाश्ते के वह ऑफिस न चला गया हो ?
पता नहीं लंच पर घर आया हो या काम में उलझा हो ?
शाम तक फोन न आने पर
उसका आत्मालाप हो उठता है
मुखर
"जब उसको हमारी चिंता नहीं है
तो मैं ही क्यों करूँ ?"
इतना कहकर
टीवी खोलकर
या कोई धार्मिक पुस्तक लेकर
जाती है बैठ
पर कान
फोन की घंटी पर ही लगे रहते हैं ।
माँ,
जो कछुए की तरह
अहर्निश चिन्तन करती है
अपने बच्चों का ।
माँ,
जो
महीने में १० दिन व्रत  करती है
बच्चों के लिए ।
माँ,
जो
तीर्थ यात्राओं में
तीर्थों से मांगती है
केवल और केवल
बच्चों का कल्याण ।
माँ,
जो
बच्चों पर जरा सा भी संकट आने पर
तुरंत जाती है पहुँच
शरण में
माँ संकटा देवी के ।
माँ,
जिसे
अपनी बहू नासमझ
और लड़का समझदार लगता है ।
माँ,
जिसे
अपनी लड़की समझदार
और दामाद  नासमझ लगता है ।
माँ,
जिसके लिए
हमने एक दिन निश्चित कर दिया है ।
माँ,
उस दिन का इंतजार करती है
बेसब्री से
कब सुबह हो ?
कब बच्चों के मुख से " हैप्पी मदर्स डे"
सुनने को मिले और वह धन्य हो जाये ।
कितने आधुनिक हो गए हैं हम
भूल गए हैं हम
अपनी सारी परम्पराएँ ।
भूल गए है
अपने सांस्कृतिक मूल्य ।
हम,
उस संस्कृति के वाहक हैं
जहाँ
सुबह उठकर
धरती माँ पर चरण रखने के पहिले
मांगी जाती है क्षमा माँ से
"समुद्र वसने देवि,पर्वत स्तन मंडले,
विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यम्, पाद स्पर्शम क्षमस्व मे "।
पृथ्वी माता से मांगने के बाद क्षमा
सबसे पहिले प्रणाम किया जाता था
जननी को ।
और उसके बाद नंबर आता था
पिता और गुरु का
"प्रातकाल उठके रघुनाथा,मातु,पिता,गुरु नावहिं माथा"।
हम,
वाहक है उस संस्कृति के
जहाँ माता का स्थान सर्वोपरि था ।
माँ,
जिसे पूरा अधिकार था
पिता के आदेश में संशोधन करने का
"जौं केवल पितु आयुष ताता, तौं जनि जाहु जानि बड़ि माता
जौं पितु-मातु कह्यो बन जाना, तौं कानन सत अवध समाना "
मुझे माफ़ करना
मेरे देशवासियों
मैं,
नहीं मना पाउंगा
तुम्हारे साथ "मदर्स डे"
क्योंकि
मेरी माँ
मेरी हर साँस में बसती है
जीवन की अंतिम साँस तक
ऋणी रहूँगा
मैं,
अपनी माँ का
कोई भी आभार प्रदर्शन
नहीं मुक्त कर सकता मुझे
अपनी जननी के ऋण से
                             
                                                  शेष प्रभु कृपा |